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ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ४०


[ऋषि - कण्व धौर । देवता - ब्रह्मणस्पति । छन्द बाहर्त प्रगाध(विषमा बृहती, समासतो बृहती)।]
४८२.उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे ।
उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा ॥१॥
हे ब्रह्मणस्पते! आप उठें, देवो की कामना करने वाले हम आपकी स्तुति करते है। कल्याणकारी मरुद्‍गण हमारे पास आयें। हे इन्द्रदेव। आप ब्रह्मणस्पति के साथ मिलकर सोमपान करें॥१॥

४८३.त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते ।
सुवीर्यं मरुत आ स्वश्व्यं दधीत यो व आचके ॥२॥
साहसिक कार्यो के लिये समर्पित हे ब्रह्मणस्पते! युद्ध मे मनुष्य आपका आवाहन करतें है। हे मरुतो! जो धनार्थी मनुष्य ब्रह्मणस्पति सहित आपकी स्तुति करता है, वह उत्तम अश्वो के साथ श्रेष्ठ पराक्रम एवं वैभव से सम्पन्न हो॥२॥

४८४.प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता ।
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥३॥
ब्रह्मणस्पति हमारे अनुकूल होकर यज्ञ मे आगमन करें। हमे सत्यरूप दिव्यवाणी प्राप्त हो। मनुष्यो के हितकरी देवगण हमारे यज्ञ मे पंक्तिबद्ध होकर अधिष्ठित हों तथा शत्रुओं का विनाश करें॥३॥

४८५.यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः ।
तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम् ॥४॥
जो यजमान ऋत्विजो को उत्तम धन देते है,वे अक्षय यश को पाते है, उनके निमित्त हम (ऋत्विग्गण) उत्तम पराक्रमी, शत्रु नाशक, अपराजेय, मातृभूमि की वन्दना करते हैं॥४॥

४८६.प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम् ।
यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे ॥५॥
ब्रह्मणस्पति निश्चय ही स्तुति योग्य (उन) मंत्रो को विधि से उच्चारित कराते हैं, जिन मंत्रो मे इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा आदि देवगण निवास करते हैं॥५॥

४८७.तमिद्वोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम् ।
इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत् ॥६॥
हे नेतृत्व करने वालो! (देवताओ!) हम सुखप्रद, विघ्ननाशक मंत्र का यज्ञ मे उच्चारण करते है। हे नेतृत्व करने वाले देवो! यदि आप इस मन्त्र रूप वाणी की कामना करते हैं,(सम्मानपूर्वक अपनाते है) तो यह सभी सुन्दर स्तोत्र आपको निश्चय ही प्राप्त हों॥६॥

४८८.को देवयन्तमश्नवज्जनं को वृक्तबर्हिषम् ।
प्रप्र दाश्वान्पस्त्याभिरस्थितान्तर्वावत्क्षयं दधे ॥७॥
देवत्व की कामना करनेवालो के पास भला कौन आयेंगे?(ब्रह्मणस्पति आयेंगें।) कुश-आसन बिछाने वाले के पास कौन आयेंगे ? (ब्रह्मणस्पति आयेंगें।) आपके द्वारा हविदाता याजक अपनी संतानो, पशुओ आदि के निमित्त उत्तम घर का आश्रय पाते है॥७॥


४८९.उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे ।
नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्भे अस्ति वज्रिणः ॥८॥
ब्रह्मणस्पतिदेव, क्षात्रबल की अभिवृद्धि कर राजाओ की सहायता से शत्रुओं को मारते है। भय के सम्मुख वे उत्तम धैर्य को धारण करते है। ये वज्रधारी बड़े युद्धो या छोटे युद्धो मे किसी से पराजित नही होते॥८॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३९


[ऋषि - कण्व धौर । देवता- मरुद्‍गण । छन्द - बाहर्त प्रगाथ(विषमा बृहती, समासतो बृहती)]

४७२.प्र यदित्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ ।
कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्पसा कं याथ कं ह धूतयः ॥१॥
हे कंपाने वाले मरुतो! आप अपना बल दूरस्थ स्थान से विद्युत के समान यहां पर फेंकते हैं, तो आप (किसके यज्ञ की ओर) किसके पास जाते हैं? किस उद्देश्य से आप कहां जाना चाहते हैं? उस समय आपका लक्ष्य क्या होता है?॥१॥

४७३.स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे ।
युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः ॥२॥
आपके हथियार शत्रु को हटाने मे नियोजित हों। आप अपनी दृढ़ शक्ति से उनका प्रतिरोध करें। आपकी शक्ति प्रशंसनीय हो। आप छद्म वेषधारी मनुष्यो को आगे न बढ़ायें ॥२॥

४७४.परा ह यत्स्थिरं हथ नरो वर्तयथा गुरु ।
वि याथन वनिनः पृथिव्या व्याशाः पर्वतानाम् ॥३॥
हे मरुतो! आप स्थिर वृक्षो को गिराते, दृढ़ चट्टानो को प्रकम्पित करते, भूमि के वनो को जड़ विहीन करते हुए पर्वतो के पार निकल जाते हैं॥३॥

४७५.नहि वः शत्रुर्विविदे अधि द्यवि न भूम्यां रिशादसः ।
युष्माकमस्तु तविषी तना युजा रुद्रासो नू चिदाधृषे ॥४॥
हे शत्रुनाशक मरुतो! न द्युलोक मे और न पृथ्वी पर ही, आपके शत्रुओं का आस्तित्व है। हे रूद्र पुत्रो! शत्रुओ को क्षत-विक्षत करने के लिए आप सब मिलकर अपनी शक्ति विस्तृत करें॥४॥

४७६.प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्चन्ति वनस्पतीन् ।
प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वया विशा ॥५॥
हे मरुतो! मदमत्त हुए लोगो के समान आप पर्वतो को प्रकम्पित करते है और पेड़ो को उखाड़ कर फेंकते है, अतः आप प्रजाओ के आगे आगे उन्नति करते हुए चलें॥५॥

४७७.उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिर्वहति रोहितः ।
आ वो यामाय पृथिवी चिदश्रोदबीभयन्त मानुषाः ॥६॥
हे मरुतो! आपके रथ को चित्र-विचित्र चिह्नो युक्त(पशु आदि) गति देते हैं, उनमे लाल रंग वाला अश्व धुरी को खींचता है। तुम्हारी गति से उत्पन्न शब्द भूमि सुनती है, मनुष्यगण उस ध्वनि से भयभीत हो जातें हैं॥६॥

४७८.आ वो मक्षू तनाय कं रुद्रा अवो वृणीमहे ।
गन्ता नूनं नोऽवसा यथा पुरेत्था कण्वाय बिभ्युषे ॥७॥
हे रूद्रपुत्रो! अपनी संतानो की रक्षा के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं। जैसे पूर्व समय मे आप भययुक्त कण्वो की रक्षा के निमित्त शीघ्र गये थे, उसी प्रकार आप हमारी रक्षा के निमित्त शीघ्र पधांरे॥७॥

४७९.युष्मेषितो मरुतो मर्त्येषित आ यो नो अभ्व ईषते ।
वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः ॥८॥
हे मरुतो! आपके द्वारा प्रेरित या अन्य किसी मनुष्य द्वारा प्रेरित शत्रु हम पर प्रभुत्व जमाने आयें, तो आप अपने बल से, अपने तेज से और रक्षण साधनो से उन्हे दूर हटा दें॥८॥

४८०.असामि हि प्रयज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः ।
असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युतः ॥९॥
हे विशिष्ट पूज्य,ज्ञाता मरुतो! कण्व को जैसे आपने सम्पूर्ण आश्रय दिया था, वैसे ही चमकने वाली बिजलियों के साथ वेग से आने वाली वृष्टि की तरह आप सम्पूर्न रक्षा साधनो को लेकर हमारे पास आयें॥९॥

४८१.असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः ।
ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषुं न सृजत द्विषम् ॥१०॥
हे उत्तम दानशील मरुतो! आप सम्पूर्ण पराक्रम और सम्पूर्ण बलो को धारण करते हैं। हे शत्रु को प्रकम्पित करने वाले मरुदगणो, ऋषियो से द्वेश करने वाले शत्रुओं को नष्ट करने वाले बाण के समान आप शत्रुघातक (शक्ति) का सृजन करें॥१०॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३६

[ऋषि -कण्व धौर । देवता -अग्नि,१३-१४ यूप ।छन्द -बाहर्त प्रगाथ-विषमा बृहती, समासतो बृहती, १३ उपरिष्टाद बृहती ]

४२२.प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम् ।
अग्निं सूक्तेभिर्वचोभिरीमहे यं सीमिदन्य ईळते ॥१॥
हम ऋत्विज अपने सूक्ष्म वाक्यों(मंत्र शक्ति) से व्यक्तियो मे देवत्व का विकास करने वाली महानता का वर्णन करते है; जिस महानता का वर्णन(स्तवन) ऋषियो ने भली प्रकार किया था॥१॥

४२३.जनासो अग्निं दधिरे सहोवृधं हविष्मन्तो विधेम ते ।
स त्वं नो अद्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य ॥२॥
मनुष्यो ने बलवर्धक अग्निदेव का वरण किया। हम उन्हे हवियो से प्रवृद्ध करते हैं। अन्नो के दाता हे अग्निदेव! आज आप प्रसन्न मन से हमारी रक्षा करें॥२॥

४२४.प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् ।
महस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानवः ॥३॥
देवो के दूत, होतारुप, सर्वज्ञ हे अग्निदेव! आपका हम वरण करते है, आप महान और सत्यरूप है। आपकी ज्वालाओं की दीप्ति फैलती हुई आकाश तक पहुंचती है॥३॥

४२५.देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिन्धते ।
विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्ते ददाश मर्त्यः ॥४॥
हे अग्निदेव! मित्र, वरुण और अर्यमा ये तीनो देव आप जैसे पुरातन देवदूत को प्रदीप्त करते हैं। जो याजक आपके निमित्त हवि समर्पित करते है, वे आपकी कृपा से समस्त धनो को उपलब्ध करते हैं॥४॥

४२६.मन्द्रो होता गृहपतिरग्ने दूतो विशामसि ।
त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत ॥५॥
हे अग्निदेव! आप प्रमुदित करने वाले, प्रजाओं के पालक, होतारुप, गृहस्वामी और देवदूत है। देवो के द्वारा सम्पादित सभी शुभ कर्म आपसे सम्पादित होते है॥५॥

४२७.त्वे इदग्ने सुभगे यविष्ठ्य विश्वमा हूयते हविः ।
स त्वं नो अद्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्सुवीर्या ॥६॥
हे चिरयुवा अग्निदेव! यह आपका उत्तम सौभाग्य है कि सभी हवियां आपके अंदर अर्पित की जाती है। आप प्रसन्न होकर हमारे निमित्त आज और आगे भी सामर्थ्यवान देवो का यजन किया करें। (अर्थात देवो को हमारे अनुकूल बनायें।)॥६॥

४२८.तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते ।
होत्राभिरग्निं मनुषः समिन्धते तितिर्वांसो अति स्रिधः ॥७॥
नमस्कार करनेवाले उपासक स्वप्रकाशित इन अग्निदेव की उपासना करते है। शत्रुओं को जीतने वाले मनुष्य हवन-साधनो और स्तुतियों को प्रदीप्त करते है॥७॥

४२९.घ्नन्तो वृत्रमतरन्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे ।
भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु ॥८॥
देवो ने प्रहार कर वृत्र का वध किया। प्राणियों के निवासार्थ उन्होने द्यावा-पृथिवी और अंतरिक्ष का बहुत विस्तार किया। गौ, अश्व आदि की कामना से कण्व ने अग्नि को प्रकाशित कर आहुतियों द्वारा उन्हे बलिष्ठ बनाया॥८॥

४३०.सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः ।
वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम् ॥९॥
यज्ञीय गुणो से युक्त प्रशंसनीय हे अग्निदेव! आप देवता के प्रीतिपात्र और महान गुणो के प्रेरक है। यहां उपयुक्त स्थान पर पधारें और प्रज्वलित हों। घृत की आहुतियों द्वारा दर्शन योग्य तेजस्वी होते हुए सघन धूम्र को विसर्जित करें॥९॥

४३१.यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन ।
यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः ॥१०॥
हे हविवाहक अग्निदेव! सभी देवो ने पूजने योग्य आपको मानव मात्र के कल्याण के लिए इस यज्ञ मे धारण किया। मेध्यातिथि और कण्व ने तथा वृषा(इन्द्र) और उपस्तुत(अन्य यजमान) ने धन से संतुष्ट करने वाले आपका वरण किया॥१०॥

४३२.यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि ।
तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयामसि ॥११॥
जिन अग्निदेव को मेध्यातिथि और कण्व ने सत्यरूप कर्मो से प्रदीप्त किया, वे अग्निदेव देदीप्यमान हैं। उन्ही को हमारी ऋचायें भी प्रवृद्ध करती हैं। हम भी उन अग्निदेव को संवर्धित करते हैं॥११॥

४३३.रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम् ।
त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृळ महाँ असि ॥१२॥
हे अत्रवान अग्ने! आप हमे अन्न-सम्पदा से अभिपूरत करें। आप देवो के मित्र और प्रशंसनीय बलो के स्वामी है। आप महान है। आप हमे सुखी बनाएं॥१२॥

४३४.ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता ।
ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥१३॥
हे काष्ठ स्थित अग्निदेव! सर्वोत्पादक सवितादेव जिस प्रकार अंतरिक्ष से हम सबकी रक्षा करते है, उसी प्रकार आप भी उंचे उठकर, अन्न आदि पोषक पदार्थ देकर हमारे जीवन की रक्षा करें।मन्त्रोच्चारणपूर्वक हविप्रदान करने वाले याजक आपके उत्कृष्ट स्वरूप का आवाहन करते हैं॥१३॥

४३५.ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह ।
कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ॥१४॥
ये यूपस्थ अग्ने। आप ऊंचे उठकर अपने श्रेष्ठ ज्ञान द्वारा पापो से हमारी रक्षा करें,मानवता के शत्रुओं का दहन करें, जीवन मे प्रगति के लिए हमे ऊंचा उठाये तथा हमारी प्रार्थना देवों तक पहुंचाए॥१४॥

४३६.पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः ।
पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य ॥१५॥
हे महान दीप्तिवाले , चिरयुवा अग्निदेव! आप हमे राक्षसो से रक्षित करें, कृपण धूर्तो से रक्षित करें तथा हिंसक और जघन्यो से रक्षित करें॥१५॥

४३७.घनेव विष्वग्वि जह्यराव्णस्तपुर्जम्भ यो अस्मध्रुक् ।
यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत ॥१६॥
अपने ताप से रोगादि कष्टो को मिटाने वाले हे अग्ने! आप कृपणो को गदा से विनष्ट करें। जो हमसे द्रोह करते है, जो रात्रि मे जागकर हमारे नाश का यत्न करते हैं, वे शत्रु हम पर आधिपत्य न कर पाएं॥१६॥

४३८.अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्निः कण्वाय सौभगम् ।
अग्निः प्रावन्मित्रोत मेध्यातिथिमग्निः साता उपस्तुतम् ॥१७॥
उत्तम पराक्रमी हे अग्निदेव, जोन्होने कण्व को सौभाग्य प्रदान किया, हमारे मित्रो की रक्षा की तथा ’मेध्यातिथि’ और ’उपस्तुत’(यजमान) की भी रक्षा की है॥१७॥

४३९.अग्निना तुर्वशं यदुं परावत उग्रादेवं हवामहे ।
अग्निर्नयन्नववास्त्वं बृहद्रथं तुर्वीतिं दस्यवे सहः ॥१८॥
अग्निदेव के साथ हम ’तुर्वश’ ,’यदु’ और ’उग्रदेव’ को बुलाते है। वे अग्निदेव ’नववास्तु’, ’ब्रहद्रथ’ और ’तुर्वीति’(आदि राजर्षियों) को भी ले चलें, जिससे हम दुष्टो के साथ संघर्ष कर सके॥१८॥

४४०.नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते ।
दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः ॥१९॥
हे अग्निदेव! विचारवान व्यक्ति आपका वरण करते है। अनादिकाल से ही मानव जाति के लिए आपकी ज्योति प्रकाशित है। आपका प्रकाश आश्रमो के ज्ञानवान ऋषियो मे उत्पन्न होता है। यज्ञ मे ही आपका प्रज्वलित स्वरूप प्रकट होता है। उस समय सभी मनुष्य आपको नमन वंदन करते हैं॥१९॥

४४१.त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये ।
रक्षस्विनः सदमिद्यातुमावतो विश्वं समत्रिणं दह ॥२०॥
अग्निदेव की ज्वालाएं प्रदीप्त होकर अत्यन्त बलवती और प्रचण्ड हुई है। कोई उनका सामना नहीं कर सकता। हे अग्ने! आप समस्त राक्षसो, आतताइयो और मानवता के शत्रुओ को नष्ट करें॥२०॥