ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३२
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३०
[ऋषि- शुनः शेप आजीगर्ति। देवता १-१६ इन्द्र, १७-१९ अश्विनीकुमार, २०-२२ उषा। छन्द १-१०,१२-१५ तथा १७-२२ गायत्री,११ पादनिचृत् गायत्री,१६ त्रिष्टूप्।]
Technorati टैग्स: {टैग-समूह}शुनः शेप आजीगर्ति,इन्द्र,अश्विनीकुमार,उषा,गायत्री,पादनिचृत् गायत्री,त्रिष्टूप्३२९.आ व इन्द्रं क्रिविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम्। मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः॥१॥
जिस प्रकार अन्न की इच्छा वाले,खेत मे पानी सींचते है, उसी तरह हम बल की कामना वाले साधक इन महान् इन्द्रदेव को सोमरस से सींचते है॥१॥३३०.शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदु निम्नं न रीयते॥२॥
नीचे की ओर जाने वाले जल के समान सैकड़ो कलश सोमरस, सहस्त्रो कलश दूध मे मिश्रित होकर इन्द्रदेव को प्राप्त होता है॥२॥३३१.सं यन्मदाय शुष्मिण एना ह्यस्योदरे। समुद्रो न व्यचो दधे॥३॥
समुद्र मे एकत्र हुये जल के सदृश सोमरस इन्द्रदेव के पेट मे एकत्र होकर उन्हे हर्ष प्रदान करता है॥३॥३३२.अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे॥४॥
हे इन्द्रदेव ! कपोत जिस स्नेह के साथ गर्भवती कपोती के पास रहता है, उसी प्रकार यह सोमरस आपके लिये प्रस्तुत है। आप हमारे निवेदन को स्वीकारे॥४॥३३३.स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते। विभूतिरस्तु सूनृता॥५॥
जो (स्तोतागण), हे इन्द्र! हे धनाधिपति! हे स्तुतियों के आश्रयभूत! हे वीर! (इत्यादि) स्तुतियाँ करते है, उनके लिये आपकी विभूतियाँ प्रिय एवं सत्य सिद्ध हो॥५॥३३४.ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतयेऽस्मिन्वाजे शतक्रतो। समन्येषु ब्रवावहै॥६॥
सैकड़ो यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यो को सम्पन्न करने वाले हे इन्द्रदेव! संघर्षो (जीवन संग्राम) मे हमारे संरक्षण के लिये आप प्रयत्नशील रहे। हम आप से अन्य (श्रेष्ठ) कार्यो के विषय मे भी परस्पर विचार-विनिमय करते रहे॥६॥३३५.योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥७॥
सत्कर्मो के शुभारम्भ मे एवं हर प्रकार के संग्राम मे बलशाली इन्द्रदेव का हम अपने संरक्षण के लिये मित्रवत आवाहन करते हैं॥७॥३३६.आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः। वाजेभिरुप नो हवम्॥८॥
हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर वे इन्द्रदेव निश्चित ही सहस्त्रो रक्षा साधनो तथा अन्न ,ऐश्वर्य आदि सहित हमारे पास आयेंगे॥८॥३३७.अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्। यं ते पूर्वं पिता हुवे॥९॥
हम सहायता के लिये स्वर्गधाम के वासी, बहुतो के पास पहुँचकर उन्हे नेतृत्व प्रदान करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते है। हमारे पिता ने भी ऐसा ही किया था॥९॥३३८.तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत। सखे वसो जरितृभ्यः॥१०॥
हे विश्ववरणीय इन्द्रदेव! बहुतो द्वारा आवाहित किये जाने वाले आप स्तोताओ के आश्रयदाता और मित्र है। हम ऋत्विग्गण आओअ से उन स्तोताओ को अनुगृहीत करने की प्रार्थना करते है॥१०॥३३९.अस्माकं शिप्रिणीनां सोमपाः सोमपाव्नाम्। सखे वज्रिन्सखीनाम्॥११॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव! सोम पीने के योग्य हमारे प्रियजनो और मित्रजनो मे आप ही श्रेष्ठ सामर्थ्य वाले है॥११॥
३४०.तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु। यथा त उश्मसीष्टये॥१२॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव! आप हमारी इच्छा पूर्ण करें। हम इष्टप्राप्ति के निमित्त आपकी कामना करे और वह पूर्ण हो॥१२॥३४१.रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः। क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥१३॥
जिन (इन्द्रदेव) की कृपा से हम धन-धान्य से परिपूर्ण होकर प्रफुल्लित होते हैं। उन इन्द्रदेव के प्रभाव से हमारी गौएँ भी प्रचुर मात्रा मे दुग्ध-घृतादि देने की सामर्थ्य वाली हों॥१३॥३४२.आ घ त्वावान्त्मनाप्त स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः। ऋणोरक्षं न चक्र्योः॥१४॥
हे धैर्यशाली इन्द्रदेव! आप कल्याणकारी बुद्धि से स्तुति करने वाले स्तोताओ को अभीष्ट पदार्थ अवश्य प्रदान करें। आप स्तोताओ को धन देने के लिये रथ के चक्रो को मिलाने वाली धुरी के समान ही सहायक है॥१४॥३४३.आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम्। ऋणोरक्षं न शचीभिः॥१५॥
हे इन्द्रदेव! आप स्तोताओ द्वारा इच्छित धन उन्हे प्रदान करें। जिस प्रकार रथ की गति से उसके अक्ष को भी गति मिलती है, उसी प्रकार स्तुतिकर्ताओ को धन की प्राप्ति हो॥१५॥३४४.शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि।
स नो हिरण्यरथं दंसनावान्स नः सनिता सनये स नोऽदात् ॥१६॥
सदैव स्फूर्तिवान,सदैव (शब्दवान) हिनहिनाते हुये तीव्र गतिशील अश्वो के द्वारा जो इन्द्रदेव शत्रुओ के धन को जीतते है; उन पराक्रमशील इन्द्रदेव ने अपने स्नेह से अपने स्नेह से हमे सोने का रथ (अकूत-वैभव) दिया है॥१६॥३४५.आश्विनावश्वावत्येषा यातं शवीरया। गोमद्दस्रा हिरण्यवत्॥१७॥
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो! आप बलशाली अश्वो के साथ अन्नो, गौओ और् स्वर्णादि धनो को लेकर यहाँ पधारें॥१७॥३४६.समानयोजनो हि वां रथो दस्रावमर्त्यः। समुद्रे अश्विनेयते॥१८॥
हे अश्विनीकुमारो! आप दोनो के लिये जुतने वाला एक ही रथ आकाशमार्ग से जाता है। उसे कोई नष्ट नही कर सकता॥१८॥३४७.न्यघ्न्यस्य मूर्धनि चक्रं रथस्य येमथुः। परि द्यामन्यदीयते॥१९॥
हे अश्विनीकुमारो! आप के रथ (पोषण प्रक्रिया) का एक चक्र पृथ्वी के मूर्धा भाग मे (पर्यावरण चक्र के रूप मे) स्थित है और दूसरा चक्र द्युलोक मे सर्वत्र गतिशील है॥१९॥३४८.कस्त उषः कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये। कं नक्षसे विभावरि॥२०॥
हे स्तुति-प्रिय, अमर, तेजोमयी उषे! कौन मनुष्य आपका अनुदान प्राप्त करता है ? किसे आप प्राप्त होती है? (अर्थात प्रायः सभी मनुष्य आलस्यादि दोषो के कारणा आप का लाभ पूर्णतया नही प्राप्त कर पाते)॥२०॥३४९.वयं हि ते अमन्मह्यान्तादा पराकात्। अश्वे न चित्रे अरुषि ॥२१॥
हे अश्व (किरणो) युक्त चित्र विचित्र प्रकाश वाली उषे! हम दूर अथवा पास से आपकी महिमा समझने मे समर्थ नही है॥२१॥३५०.त्वं त्येभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः। अस्मे रयिं नि धारय ॥२२॥
हे द्युलोक की पुत्री उषे! आप उन (दिव्य) बलो के साथ यहाँ आयें और हमे उत्तम ऐश्वर्य धारण करायें॥२२॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २९
३२२.यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥१॥
३२३.शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥२॥
३२४.नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥३॥
३२५.ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥४॥
३२६.समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥५॥
३२७.पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥६॥
३२८.सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥७॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २८
३१३.यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥१॥
३१४.यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥२॥
३१५.यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥३॥
३१६.यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥४॥
३१७.यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः॥५॥
३१८.उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्। अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल॥६॥
३१९.आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भृतः। हरी इवान्धांसि बप्सता॥७॥
३२०.ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः। इन्द्राय मधुमत्सुतम्॥८॥
३२१.उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि॥९॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २३
२३०.तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे। वायो तान्प्रस्थितान्पिब॥१॥
२३१.उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये॥२॥
२३२.इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये। सहस्राक्षा धियस्पती॥३॥
२३३.मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये। जज्ञाना पूतदक्षसा॥४॥
२३४.ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती। ता मित्रावरुणा हुवे॥५॥
२३५.वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः। करतां नः सुराधसः॥६॥
२३६.मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये। सजूर्गणेन तृम्पतु॥७॥
२३७.इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूषरातयः। विश्वे मम श्रुता हवम्॥८॥
२३८.हत वृत्रं सुदानव इन्द्रेण सहसा युजा। मा नो दुःशंस ईशत॥९॥
२३९.विश्वान्देवान्हवामहे मरुतः सोमपीतये। उग्रा हि पृश्निमातरः॥१०॥
२४०.जयतामिव तन्यतुर्मरुतामेति धृष्णुया। यच्छुभं याथना नरः॥११॥
२४१.हस्काराद्विद्युतस्पर्यतो जाता अवन्तु नः। मरुतो मृळयन्तु नः॥१२॥
२४२.आ पूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः। आजा नष्टं यथा पशुम्॥१३॥
२४३.पूषा राजानमाघृणिरपगूळ्हं गुहा हितम्। अविन्दच्चित्रबर्हिषम्॥१४॥
२४४.उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत्। गोभिर्यवं न चर्कृषत्॥१५॥
२४५.अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्। पृञ्चतीर्मधुना पयः॥१६॥
२४६.अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह। ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्॥१७॥
२४७.अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः॥१८॥
२४८.अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥१९॥
२४९.अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा। अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः॥२०॥
२५०.आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक्च सूर्यं दृशे॥२१॥
२५१.इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि। यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्॥२२॥
२५२.आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि। पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा॥२३॥
२५३.सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा। विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात्सह ऋषिभिः॥२४॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २१
[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- इन्द्राग्नि। छन्द -गायत्री]
२०३.इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित्स्तोममुश्मसि । ता सोमं ओमापातामा ॥१॥
इस यज्ञ स्थल पर हम इन्द्र एवं अग्निदेवो का आवाहन करते हैं, सोमपान के उन अभिलाषियो की स्तुति करते हुए सोमरस पीने का निवेदन करते हैं॥१॥
२०४.ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नरः । ता गायत्रेषु गायत ॥२॥
हे ऋत्विजो! आप यज्ञानुष्ठान करते हुये इन्द्र एवं अग्निदेवो की शस्त्रो (स्तोत्रो) से स्तुति करे, विविध अंलकारो से उन्हे विभूषित करे तथा गायत्री छन्दवाले सामगान (गायत्र साम) करते हुये उन्हे प्रसन्न करें॥२॥
२०५.ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे । सोमपा सोमपीतये ॥३॥
सोमपान की इच्छा करनेवाले मित्रता एवं प्रशंसा के योग्य उन इन्द्र एवं अग्निदेवो को हम सोमरस पीने के लिये बुलाते हैं॥३॥
२०६.उग्रा सन्ता हवामह उपेदं सवनं सुतम् । इन्द्राग्नी एह गच्छताम् ॥४॥
अति उग्र देवगण एवं अग्निदेवो को सोम के अभिषव स्थान(यज्ञस्थल) पर आमन्त्रित करते हैं, वे यहाँ पधारें॥४॥
२०७.ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम् । अप्रजाः सन्त्वत्रिणः॥५॥
देवो मे महान वे इन्द्र अग्निदेव सत्पुरुषो के स्वामी(रक्षक) हैं। वे राक्षसो को वशीभूत कर सरल स्वभाव वाला बनाएँ और मनुष्य भक्षक राक्षसो को मित्र-बांधवो से रहित करके निर्बल बनाएँ॥५॥
२०८.तेन सत्येन जागृतमधि प्रचेतुने पदे । इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम् ॥६॥
हे इन्द्राग्ने! सत्य और चैतन्य रूप यज्ञस्थान पर आप संरक्षक के रूप मे जागते रहें और हमे सुख प्रदान करें॥६॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १८
[ऋषि-मेधातिथी काण्व। देवता- १-३ ब्रह्मणस्पति, ४ इन्द्र,ब्रह्मणस्पति,सोम ५-ब्रह्मणस्पति,दक्षिणा, ६-८ सदसस्पति,९,नराशंस। छन्द -गायत्री]
सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥१॥
हे सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति ब्रह्मणस्पति देव! सोम का सेवन करने वाले यजमान को आप उशिज् के पुत्र कक्षीवान की तरह श्रेष्ठ प्रकाश से युक्त करें॥१॥
यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥२॥
ऐश्वर्यवान, रोगो का नाश करने वाले,धन प्रदाता और् पुष्टिवर्धक तथा जो शीघ्रफलदायक है, वे ब्रह्मणस्पति देव हम पर कृपा करें॥२॥
मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते ॥३॥
हे ब्रह्मणस्पति देव! यज्ञ न करनेवाले तथा अनिष्ट चिन्तन करनेवाले दुष्ट शत्रु का हिंसक, दुष्ट प्रभाव हम पर न पड़े। आप हमारी रक्षा करें॥३॥
स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः । सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥४॥जिस मनुष्य को इन्द्रदेव,ब्रह्मणस्पतिदेव और सोमदेव प्रेरित करते है, वह वीर कभी नष्ट नही होता॥४॥
[इन्द्र से संगठन की, ब्रह्मणस्पतिदेव से श्रेष्ठ मार्गदर्शन की एव सोम से पोषण की प्राप्ति होती है। इनसे युक्त मनुष्य क्षीण नही होता। ये तीनो देव यज्ञ मे एकत्रित होते हैं। यज्ञ से प्रेरित मनुष्य दुःखी नही होता वरन् देवत्व प्राप्त करता है।
त्वं तं ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् । दक्षिणा पात्वंहसः॥५॥
हे ब्रह्मणस्पतिदेव। आप सोमदेव, इन्द्रदेव और दक्षिणादेवी के साथ मिलकर् यज्ञादि अनुष्ठान करने वाले मनुष्य़ की पापो से रक्षा करें॥५॥
सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषम् ॥६॥
इन्द्रदेव के प्रिय मित्र, अभीष्ट पदार्थो को देने मे समर्थ, लोको का मर्म समझने मे सक्षम सदसस्पतिदेव (सत्प्रवृत्तियो के स्वामी) से हम अद्भूत मेधा प्राप्त करना चाहते है॥६॥
यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन । स धीनां योगमिन्वति ॥७॥जिनकी कृपा के बिना ज्ञानी का भी यज्ञ पूर्ण नही होता, वे सदसस्पतिदेव हमारी बुद्धि को उत्तम प्रेरणाओ से युक्त करते है॥७॥
[सदाशयता जिनमे नही, ऐसे विद्वानो द्वारा यज्ञीय प्रयोजनो की पूर्ति नही होती।]
आदृध्नोति हविष्कृतिं प्राञ्चं कृणोत्यध्वरम् । होत्रा देवेषु गच्छति॥८॥
वे सदसस्पतिदेव हविष्यान्न तैयार करने वाले साधको तथा यज्ञ को प्रवृद्ध करते है और वे ही हमारी स्तुतियों को देवो तक पहुंचाते हौ॥८॥
नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् । दिवो न सद्ममखसम् ॥९॥
द्युलोक से सदृश अतिदीप्तिमान्, तेजवान,यशस्वी और् मनुष्यो द्वारा प्रशंसित वे सदसस्पतिदेव को हमने देखा है॥९॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १७
१६८.इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे । ता नो मृळात ईदृशे ॥१॥
हम इन्द्र और वरुण दोनो प्रतापी देवो से अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं। वे दोनो हम पर इस प्रकार अनुकम्पा करें, जिससे कि हम सुखी रहें॥१॥
१६९.गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः । धर्तारा चर्षणीनाम् ॥२॥
हे इन्द्रदेव और वरुणदेवो! आप दोनो मनुष्यो के सम्राट, धारक एवं पोषक हैं। हम जैसे ब्राह्मणो के आवाहन पर सुरक्षा ले लिये आप निश्चय ही आने को उद्यत रहते हैं॥२॥
१७०.अनुकामं तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ । ता वां नेदिष्ठमीमहे॥३॥हे इन्द्रदेव और वरुणदेवो! हमारी कामनाओ के अनुरूप धन देकर हमें संतुष्ट करें। आप दोनो के समीप पहुचँकर हम प्रार्थना करते हैं॥३॥
१७१.युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् । भूयाम वाजदाव्नाम् ॥४॥हमारे कर्म संगठित हो, हमारी सद्बुद्धीयाँ संगठित हो, हम अग्रगण्य होकर दान करने वाले बनें॥४॥
१७२.इन्द्रः सहस्रदाव्नां वरुणः शंस्यानाम् । क्रतुर्भवत्युक्थ्यः॥५॥इन्द्रदेव सहस्त्रो दाताओ मे सर्वश्रेष्ठ है और् वरुणदेव सहस्त्रो प्रशंसनीय देवो मे सर्वश्रेष्ठ हैं॥५॥
१७३.तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि । स्यादुत प्ररेचनम्॥६॥आपके द्वारा सुरक्षित धन को प्राप्त कर हम उसका श्रेष्ठतम उपयोग करें। वह धन हमे विपुल मात्रा मे प्राप्त हो॥६॥
१७४.इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे । अस्मान्सु जिग्युषस्कृतम्॥७॥
हे इन्द्रावरुण देवो! विविध प्रकार के धन की कामना से हम आपका आवाहन करते है। आप हमे उत्तम विजय प्राप्त कराएँ॥७॥
१७५.इन्द्रावरुण नू नु वां सिषासन्तीषु धीष्वा । अस्मभ्यं शर्म यच्छतम्॥८॥हे इन्द्रावरुण देवो! हमारी बुद्धियाँ सम्यक् रूप से आपकी सेवा करने की इच्छा करती है, अतः हमे शीघ्र ही निश्चयपूर्वक सुख प्रदान करें॥८॥
१७६.प्र वामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे । यामृधाथे सधस्तुतिम्॥९॥
हे इन्द्रावरुण देवो! जिन उत्तम स्तुतियों के लिये हम आप दोनो का आवाहन करते हैं एवं जिन स्तुतियो को साथ साथ प्राप्त करके आप दोनो पुष्ट होते हैं, वे स्तुतियाँ आपको प्राप्त हों॥९॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १६
१५९.आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये ।इन्द्र त्वा सूरचक्षसः ॥१॥
१६०.इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोप वक्षतः ।इन्द्रं सुखतमे रथे ॥२॥
१६१.इन्द्रं प्रातर्हवामह इन्द्रं प्रयत्यध्वरे ।इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥३॥
१६२.उप नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः ।सुते हि त्वा हवामहे ॥४॥
१६३.सेमं न स्तोममा गह्युपेदं सवनं सुतम् ।गौरो न तृषितः पिब ॥५॥
१६४.इमे सोमास इन्दवः सुतासो अधि बर्हिषि ।ताँ इन्द्र सहसे पिब ॥६॥
१६५.अयं ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शंतमः ।अथा सोमं सुतं पिब ॥७॥
१६६.विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति ।वृत्रहा सोमपीतये ॥८॥
१६७.सेमं नः काममा पृण गोभिरश्वैः शतक्रतो ।स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥९॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १५
[ऋषि - मेधातिथि काण्व। देवता-(प्रतिदेवता ऋतु सहित) १-५ इन्द्रदेव, २ मरुद्गण,३ त्वष्टा, ४,१२ अग्नि,६ मित्रावरुण, ७,१० द्रविणोदा,११ अश्विनीकुमार। छन्द-गायत्री।]
१४७.इन्द्र सोमं पिब ऋतुना त्वा विशन्त्विन्दवः । मत्सरासस्तदोकसः॥१॥
हे इन्द्रदेव! ऋतुओ के अनुकूल सोमरस का पान करें, ये सोमरस आपके शरीर मे प्रविष्ट हो; क्योंकि आपकी तृप्ति का आश्रयभूत साधन यही सोम है ॥१॥
१४८.मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद्यज्ञं पुनीतन । यूयं हि ष्ठा सुदानवः॥२॥
दानियो मे श्रेष्ठ हे मरुतो! आप पोता नामक ऋत्विज् के पात्र से ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें एवं हमारे इस यज्ञ को पवित्रता प्रदान करें ॥२॥
१४९.अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना । त्वं हि रत्नधा असि॥३॥हे त्वष्टादेव! आप पत्नि सहित हमारे यज्ञ की प्रशंसा करे, ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें! आप निश्चय ही रत्नो को देनेवाले है॥३॥
१५०.अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिषु । परि भूष पिब ऋतुना॥४॥हे अग्निदेव! आप देवो को यहाँ बुलाकर उन्हे यज्ञ के तीनो सवनो (प्रातः, माध्यन्दिन एवं सांय) मे आसीन करें। उन्हे विभूषित करके ऋतु के अनुकूल सोम का पान करें ॥४॥
१५१.ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोममृतूँरनु । तवेद्धि सख्यमस्तृतम्॥५॥हे इन्द्रदेव! आप ब्रह्मा को जानने वाले साधक के पात्र से सोमरस का पान करे, क्योंकि उनके साथ आपकी अविच्छिन्न मित्रता है॥५॥
१५२.युवं दक्षं धृतव्रत मित्रावरुण दूळभम् । ऋतुना यज्ञमाशाथे ॥६॥
हे अटल व्रत वाले मित्रावरुण! आप दोनो ऋतु के अनुसार बल प्रदान करने वाले है। आप कठिनाई से सिद्ध होने वाले इस यज्ञ को सम्पन्न करते हैं॥६॥
१५३.द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे । यज्ञेषु देवमीळते॥७॥
धन की कामना वाले याजक सोमरस तैयार करने के निमित्त हाथ मे पत्थर धारण् करके पवित्र यज्ञ मे धनप्रदायक अग्निदेव की स्तुति करते है॥७॥
१५४.द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे । देवेषु ता वनामहे॥८॥हे धन प्रदायक अग्निदेव! हमे वे सभी धन प्रदान करे, जिनके विषय मे हमने श्रवण किया है। वे समस्त धन हम देवगणो को ही अर्पित करते हैं॥८॥
[देव शक्तियो से प्राप्त विभूतियो का उपयोग देवकार्यो के लिये ही करने का भाव व्यक्त किया गया है।]
१५५.द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत । नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत॥९॥हे धन प्रदायक अग्निदेव! नेष्टापात्र (नेष्टधिष्ण्या स्थान-यज्ञ कुण्ड) से ऋतु के अनुसार सोमरस पीने की इच्छा करते है। अतः हे याजक गण! आप वहाँ जाकर यज्ञ करें और पुन: अपने निवास स्थान के लिये प्रस्थान करें ॥९॥
१५६.यत्त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे । अध स्मा नो ददिर्भव॥१०॥हे धन प्रदायक अग्निदेव! ऋतुओ के अनुगुत होकर हम आपके निमित्त सोम के चौथे भाग को अर्पित करते है, इसलिये आप हमारे लिये धन प्रदान करने वाले हो ॥१०॥
१५७.अश्विना पिबतं मधु दीद्यग्नी शुचिव्रता । ऋतुना यज्ञवाहसा॥११॥
दिप्तिमान, शुद्ध कर्म करने वाले, ऋतु के अनुसार यज्ञवाहक हे अश्विनीकुमारो! आप इस मधुर सोमरस का पान करें॥११॥
१५८.गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि । देवान्देवयते यज ॥१२॥
हे इष्टप्रद अग्निदेव! आप गार्हपत्य के नियमन मे ऋतुओ के अनुगत यज्ञ का निर्वाह करने वाले हैं, अतः देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजको के निमित्त देवो का यजन करें॥१२॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ११
१०३. इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः। रथीतमं रथीनां वाजानां
सतपर्ति पतिम्॥१॥
समुद्र के तुल्य व्यापक, सब रथियो मे महानतम, अन्नो के स्वामी और सत्प्रवृत्तियो के पालक इन्द्रदेव को समस्त स्तुतियां अभिवृद्धि प्रदान करती हैं ॥१॥
१०४. सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते। त्वामभि प्र णोनुमो
जेतारमपराजितम्॥२॥
हे बलरक्षक इन्द्रदेव! आपकी मित्रता से हम बलशाली होकर किसी से न डरें। हे अपराजेय - विजयी इन्द्रदेव! हम साधक गण आपको प्रणाम करते हैं ॥२॥
१०५. पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्तन्त्यूतयः। यदी वाजस्य गोमतः
स्तोतृभ्यो मंहते मघम्॥३॥
देवराज इन्द्र की दानशिलता सनातन है। ऐसी स्थिति मे आज के यजमान भी स्तोताओ को गवादि सहित अन्न दान करते है तो इन्द्रदेव द्वारा की गई सुरक्षा अक्षुण्ण रहती है ॥३॥
१०६. पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत। इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता
वज्री पुरुष्टुतः॥४॥
शत्रु के नगरो को विनष्ट करने वाले हे इन्द्रदेव युवा ज्ञाता, अतिशक्तिशाली, शुभ कार्यो के आश्रयदाता तथा सर्वाधिक कीर्ति-युक्त होकर विविधगुण समपन्न हुये हैं॥४॥
१०७. त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् । त्वा देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानस
आविषुः॥५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव। आपने गौओ (सूर्य किरणो) को चुराने वाले असुरो के व्युह को नष्ट किया, तब असुरो से पराजित हुये देवगण आपके साथ आकर संगठित हुए॥५॥
१०८. तवांह शूर रातिभिःप्रत्यायं सिन्धुमावदन्। उपातिष्ठन्त गिर्वणोसंग्रामशूर हे इन्द्रदेव आपकी दानशीलता से आकृष्ट होकर हम होतागण पुनः आपके पास आये है। हे स्तुत्य इन्द्रदेव! सोमयाग मे आपकी प्रशंसा करते हुये ये ऋत्विज एवं यजमान आपकी दानशिलता को जानते है ॥६॥
विदुष्टे तस्य कारवः ॥६॥
१०९. मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिर:। विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां
श्रवांस्युत्तिर॥७॥
हे इन्द्रदेव! अपनी माता द्वारा आपने ’शुष्ण’(एक राक्षस) को पराजित किया। जो बुद्धीमान आपकी इस माया को जानते है, उन्हे यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें ॥७॥
११० इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत। सहस्त्र यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसी: ॥८॥
स्तोतागण, असंख्यो अनुदान देनेवाले, ओजस् (बल प्राक्रम) के कारण जगत् के नियन्ता इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे ॥८॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त १०
९१.गायन्ति त्वा गायत्रिणो ऽर्चन्त्यर्कमर्किण: । ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे॥१॥
९२. यत्सानो: सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥२॥
९३. युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा। अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुअपश्रुतिं चर ॥३॥
९४. एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्या रुव। ब्रम्ह च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय॥४॥
९५. उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुतुनिष्षिधे। शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सख्येषु च ॥५॥
९६. तमित् सखित्व ईमहे तं राते त्ं सुवीर्ये । स शक्र उत न्: शकदिन्द्रो वसु गयमानः ॥६॥
९७. सुविवृत्तं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः। गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः ॥७॥
९८. नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः। जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि॥८॥
९९. आशुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्व मे गिरः। इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्चिदन्तरम्॥९॥
१००. विद्मा हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम् । वृषन्तमस्य हूमह ऊर्तिं सहस्त्रासातमाम्॥१०॥
१०१ . आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब। नव्यमायुः प्र सू तिर कृधी सहस्त्रासामृषिम् ॥११॥
१०२. परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः। वृद्धायुमनु वृद्द्यो जुष्ता भवन्तु जुष्टयः॥१२॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ९
८१. इन्द्रेहि ,मत्स्यन्धसो विश्वेभि: सोमपर्वभि:। महाँ अभिष्टिरोजसा ॥१॥
हे इन्द्रदेव! सोमरूपी अन्नो से आप प्रफुल्लित होते है, अत: अपनी शक्ति से दुर्दान्त शत्रुओ पर विजय श्री वरण करने की क्षमता प्राप्त करने हेतु आप (यज्ञशाला मे) पधारें ॥१॥
८२. एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने । चक्रिं विश्वानि चक्रये॥२॥
(हे याजको !) प्रसन्नता देने वाले सोमरस को निचोड़कर तैयार् करो तथा सम्पूरण कार्यो के कर्ता इन्द्र देव के सामर्थ्य बढ़ाने वाले इस सोम को अर्पित करो॥२॥
८३. मतस्वा सुशिप्र मन्दिभि: स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे। सचैषु सवनेष्वा॥३॥हे उत्तम शस्त्रो से सुसज्जित (अथवा शोभन नासिका वाले), इन्द्रदेव ! हमारे इन यज्ञो मे आकर प्रफुल्लता प्रदान करने वाले स्तोत्रो से आप आनन्दित हो ॥३॥
८४.असृग्रमिन्द्र ते गिर: प्रति त्वामुदहासत। अजोषा वृषभं पतिम्॥४॥
हे इन्द्रदेव । आपकी स्तुति के लिये हमने स्तोत्रो की रचना की है। हे बलशाली और पालनकर्ता इन्द्रदेव ! इन स्तुतियो द्वारा की गई प्रार्थना को आप स्वीकार करें ॥४॥
८५.सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम् । असदित्ते विभु प्रभु॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप ही विपुल् ऐश्वर्यो के अधिपति हैं,अत: विविध प्रकार के श्रेष्ठ ऐश्वर्यो को हमारे पास प्रेरित् करें; अर्थात हमे श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें ॥५॥
८६.अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राते रभस्वत:। तुविद्युम्न यशस्वत:॥६॥
हे प्रभूत् ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव! आप वैभव की प्राप्ति के लिये हमे श्रेष्ठ कर्मो मे प्रेरित करें, जिससे हम परिश्रमी और यशस्वी हो सकें॥६॥
८७. सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्। विश्वायुर्धेह्याक्षितम्॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमे गौओ, धन धान्य से युक्त अपार वैभव एवं अक्षय पूर्णायु प्रदान करें॥७॥
८८. अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्न सहस्रसातमम् । इन्द्र रा रथिनीरिष:॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमे प्रभूत यश एवं विपुल ऐश्वर्य प्रदान करें तथा बहुत से रथो मे भरकर अन्नादि प्रदान करें॥८॥
८९. वसोरिन्द्र वसुपतिं गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम्।होम गन्तारमूतये॥९॥
धनो के अधिपति,ऐश्वर्यो के स्वामी,ऋचाओ से स्तुत्य इन्द्रदेव का हम स्तुतिपूर्वक आवाहन करते हैं। वे हमारे यज्ञ मे पधार कर, हमारे ऐश्वर्य की रक्षा करें॥९॥
९०.सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरि:। इन्द्राय शूषमर्चति ॥१०॥
सोम को सिद्ध(तैयार) करने के स्थान यज्ञस्थल पर यज्ञकर्ता, इन्द्रदेव के पराक्रम की प्रशंसा करते है॥१०॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ८
[ऋषि-मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता - इन्द्र। छन्द- गायत्री।]
७१। एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम् । वर्षिष्ठमूतये भर ॥१॥
हे इन्द्रदेव । आप हमारे जीवन संरक्षण के लिये तथा शत्रुओ को पराभूत करने के निमित्त हमे ऐश्वर्य से पूर्ण करें ॥१॥
७२. नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै। त्वोतासो न्यवर्ता ॥२॥
उस ऐश्वर्य के प्रभाव और् आपके द्वारा रक्षित अश्वो के सहयोग से हम मुक्के का प्रहार् लर (शक्ति प्रयोअग द्वारा) शत्रुओ को भगा दे ॥२॥
७३. इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि । जयेम सं युधि स्पृध: ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर तीक्ष्ण वज्रो को धारण् कर हम युद्ध मे स्पर्धा करने वाले शत्रुओ पर् विजय प्राप्त करें ॥३॥
७४. वयं शूरेबिरस्तृभिरिन्द्र त्व्या युजा वयम्। सासह्याम पृतन्यत: ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित कुशल शस्त्रचालक वीरो के साथ हम अपने शत्रुओ को पराजित करे ॥४॥
७५. महाँ इन्द्र: परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे। द्यौर्न प्रथिना शव: ॥५॥
हमारे इन्द्रदेव श्रेष्ठ और महान है। वज्रधारी इन्द्रदेव का यश द्युलोक् के समान व्यापक होकर फैले तथा इनके बल की चतुर्दिक प्रशंसा हो ॥५॥
७६.समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ। विप्रासो वा धियायव: ॥६॥
जो संग्राम मे जुटते है, जो पुत्र के निर्माण् मे जुटते है और् बुद्धीपूर्वक ज्ञान-प्राप्ति के लिये यत्न करते है, वे सब इन्द्रदेव जी स्तुति से इष्टफल पाते है॥६॥
७७. य: कुक्षि: सोमपातम: समुद्र इव पिन्वते। उर्वीरापो ब काकुद: ॥७॥
अत्याधिक सोमपान करने वाले इन्द्रदेव का उदर समुद्र की तरह विशाल हो जाता है । वह (सोमरस) जीभ से प्रवाहित होने वाले रसो की तरह सतत् द्रवित होता रहता है । सद आद्र बनाये रहता है ॥७॥
७८. एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही। पक्वा शाखा न दाशुषे॥८॥
इन्द्रदेव की अति मधुर और् सत्यवाणी उसी प्रकार सुख देती है, जिस प्रकार गो धन के दाता और पके फल वाली शाखाओ से युक्त वृक्ष यजमानो (हविदाता) को सुख देते है ॥८॥
७९. एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते। सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे॥९॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे लिये इष्टदायी और संरक्षण प्रदान करने वाली जो आपकी विभूतियाँ है, वे सभी दान देने(श्रेष्ठ कार्य मे नियोजन करने) वालो को भी तत्काल प्राप्त होती है ॥९॥
८०. एवा ह्यस्य काम्या स्तोम् उक्थं च शंस्या। इन्द्राय सोमपीतये॥१०॥
दाता की स्तुतियाँ और उक्त वचन अति मनोरम एवं प्रशंसनीय है। ये सब सोमपान करने वाले इन्द्रदेव के लिये है ॥१०॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ७
६१.इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किण:। इन्द्रं वाणीरनूषत॥१॥
६२. इन्द्र इद्धर्यो: सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा। इन्द्रो वज्री हिरण्य:॥२॥संयुक्त करने की क्षमता वाले वज्रधारी,स्वर्ण मण्डित इन्द्रदेव, वचन मात्र के इशारे से जुड़ जाने वाले अश्वो के साथी है ॥२॥
[वीर्य वा अश्व: के अनुसार पराक्रम ही अश्व है। जो पराक्रमी समय के संकेत मात्र से संगठित हो जायें, इन्द्र देवता उनके साथी है, जो अंहकारवश बिखरे रहते है, वे इन्द्रके प्रिय नही है।]
६३. इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्य रोहयद् दिवि। वि गोभिरद्रियमैरयत्॥३॥
देवशक्तियो के संगठक इन्द्रदेव ने विश्व को प्रकशित करने के महान उद्देश्य से सूर्यदेव को उच्चाकाश मे स्थापित किया, जिनने अपनी किरणो से पर्वत आदि समस्त विश्व को दर्शनार्थ प्रेरित किया॥३॥
६४. इन्द्र वाजेषु नो२व सहस्त्रप्रधेनेषु च । उग्र उग्राभिरूतिभि:॥४॥हे वीर इन्द्रदेव। आप सहस्त्रो प्रकार के धन लाभ वाले छोटे बड़े संग्रामो मे वीरता पूर्वक हमारी रक्षा करें ॥४॥
६५. इन्द्र वयं महाधन इन्द्रमभें हवामहे। युंज वृत्रेषु वज्रिणम् ॥५॥
हम छोटे बड़े सभी जिवन संग्रामो मे वृत्रासुर के संहारक, वज्रपाणि इन्द्रदेव जो सहायतार्थ बुलाते है॥५॥
६६. स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रापदावन्नापा वृधि। अस्मभ्यमप्रतिष्कुत:॥६॥
सतत दानशील,सदैव अपराजित हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिये मेघ से जल की वृष्टि करें ॥६॥
६७. तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिण: । न विन्धे अस्य सुष्टुतिम्॥७॥
प्रत्येक दान के समय, वज्रधारी इन्द्र के सदृश दान की (दानी की) उपमा कहीं अन्यंत्र नही मिलती। इन्द्रदेव की इससे अधिक उत्तम स्तुति करने मे हम समर्थ नही है ॥७॥
६८.वृषा यूथेव वंसग: कृष्टीरियर्त्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुत: ॥८॥सबके स्वामी, हमारे विरूद्ध कार्य न करने वाले, शक्तिमान इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य के अनुसार, अनुदान बाँटने के लिये मनुष्यो के पास उसी प्रकार जाते है, जैसे वृषभ गायो के समूह मे जाता है॥८॥
६९. य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरन्यति । इन्द्र: पञ्व क्षितिनाम् ॥९॥
इन्द्रदेव, पाँचो श्रेणीयो के मनुष्य (ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और निषाद ) और सब ऐश्वर्य संपदाओ के अद्वितिय स्वामी है॥९॥
७०. इन्द्र वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्य:। अस्माकमस्तु केवल:॥१०॥
हे ऋत्विजो! हे यजमानो ! सभी लोगो मे उत्तम, इन्द्रदेव को, आप सब के कल्याण के लिये हम आमंत्रित करते है, वे हमारे ऊपर विशेष कृपा करें ॥१०॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ६
[ऋषि-मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता- १-३,१० इन्द्र; ४,६,८,९ मरुद् गण;५-७ मरुद् गण और् इन्द्र;१० छन्द- गायत्री]
५१। युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुश्ष:। रोचन्ते रोचना दिवि ॥१॥
(वे इन्द्रदेव) द्युलोक मे आदित्य रूप मे, भूमि पर अहिंसक अग्नि रूप् मे, अंतरिक्ष मे सर्वत्र प्रसरणशील वायु रूप मे उपस्थित है। उन्हे उक्त तीनो लोको के प्राणी अपने कार्यो मे देवत्वरूप से संबद्ध मानते है। द्युलोक मे प्रकाशित होने वाले नक्षत्र-ग्रह उन्ही इन्द्र के स्वरूपांश है। अर्थात तीनो लोको की प्रकाशमयी-प्राणमयी शक्तीयो के वे ही एकमात्र संगठक है ॥१॥
५२.युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे।शोणा धृष्णू नृवाहसा॥२॥
इन्द्रदेव के रथ मे दोनो ओर रक्तवर्ण, संघर्षशील, मनुष्यो को गति देने वाले दो घोड़े नियोजित् रहते है ॥२॥
५३ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्धिरजायथा:॥३॥
हे मनुष्यो! तुम रात्रि मे निद्राभिभूत होकर, संज्ञा शून्य निश्चेष्ट होकर,प्रात: पुन: सचेत और सचेष्ट होकर मानो प्रतिदिन नवजीवन प्राप्त करते हो। प्रति दिन् अजन्म लेते हो ॥३॥
५४. आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे।दधाना नाम यज्ञियम् ॥४॥
यज्ञीय नाम वाले, धारण करने मे समर्थ मरुत् वास्तव मे अन्न की (वृद्धि की) कामना से बार बार (मेघ आदि) गर्भ को प्राप्त होते है॥४॥
५५. वीळु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्रिभि: । अविन्द उस्त्रिया अनु ॥५॥
हे इन्द्रदेव। सुदृढ़ किले मे बन्दी को ध्वस्त करने मे समर्थ, तेजस्वी मरुद् गणो के सहयोग से आपने गुफा मे अवरुद्ध गौओं (किरणो) को खोजकर प्राप्त किया ॥५॥
५६. देवयन्तो यथा मतिमिच्छा विदद्वसुं गिर:। महानूषत् श्रुतम् ॥६॥
देवत्व प्राप्ति की कामना वाले ज्ञानी ऋत्विज् ,महान यशस्वी, ऐश्वर्यवान वीर् मरुद्गणो की बुद्धिपूर्वक स्तुति करते है ॥६॥
५७.इन्द्रेण सं हि दृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा । मन्दू समानवर्चसा॥७॥
सदा प्रसन्न रहने वाले, समान् तेज वाले मरुद् गण निर्भय रहने वाले इन्द्रदेव के साथ संगठित अच्छे लगते है ॥७॥
५८. अनवद्यैरभिद्युभिर्मख: सहस्वदर्चति । गणैरिन्द्रस्य काम्यै: ॥८॥
इस यज्ञ मे निर्दोष, दीप्तिमान् , इष्ट प्रदायक, सामर्थ्यवान मरुद् गणो के साथी इन्द्रदेव के सामर्थ्य की पूजा की जाती है ॥८॥
५९. अत: परिज्मन्ना गहि दिवो वा रोचनादधि। समस्मिन्नृञ्जते गिर: ॥९॥
हे सर्वत्र गमनशील मरुद् गणो ! आप अंतरिक्ष से, आकाश से, अथवा प्रकाशमान द्युलोक से यहां पर आयें क्योंकि इस यज्ञ मे हमारी वाणियां आपकि स्तुति कर रही हैं ॥९॥
इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि । इन्द्र महो वा रजस: ॥१०॥
इस पृथ्वी लोक, अन्तरिक्ष लोक अथवा द्युलोक से कहीं से भी प्रभूत धन प्राप्त कराने के लिये, हम इन्द्रदेव की प्रार्थना करते हैं ॥१०॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ५
४१. आ त्वेता नि षिदतेन्द्रमभि प्र गायत । सखाय: स्तोमवाहस: ॥१॥
४२. पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् । इन्द्रं सोमे सचा सुते ॥२॥
४३. स घा नो योग आ भुवत् स राये स् पुरन्द्याम् । गमद् वाजेभिरा स न: ॥३॥
४४. यस्यं स्ंस्थे न वृण्व्ते हरी समत्सु शत्रव:। तस्मा इन्द्राय गायत॥४॥
४५. सुतओआव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये। सोमासो दध्याशिर:॥५॥
४६. त्वं सुतस्य पीतवे सद्यो वृद्धो अजायथा:। इन्द्र ज्यैष्ठय्याय सुक्रतो॥६॥
४७. आ त्वा विशन्त्वाशव: सोमास इन्द्र गिर्वण:। शं ते सन्तु प्रचेतसे॥७॥
४८. त्वा स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो। त्वां वर्धन्तु नो गिर:॥८॥
४९. अक्षितोति: सनेदिमं वाजामिन्द्र: सहस्त्रिणम् । यस्मिन्ं विश्वानि पौंस्या॥९॥
५०. मा नो मर्ता अभि द्रुहन् तनूमामिन्द्र गिर्वण:। ईशानो यवया वधम् ॥१०॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ४
३१. सुरूपकृलुमूतये सुदुघामिव गोदुहे। जुहूमसि द्यविद्यवि ॥१॥
(गो दोहन करने वाले के द्वारा) प्रतिदिन मधुर दूध प्रदान करने वाली गाय को जिस प्रकार बुलाया जाता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षण के लिये सौन्दर्यपूर्ण यज्ञकर्म सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते है ॥१॥
३२.उप न: सवना गहि सोमस्य सोमपा: पिब। गोदा इन्द्रेवतो मद: ॥२॥
सोमरस का पान करने वाले हे इन्द्रदेव! आप सोम ग्रहण करने हेतु हमारे सवन यज्ञो मे पधार कर,सोमरस पीने के बाद प्रसन्न होकर याजको को यश,वैभव और् गौंए प्रदान करें॥२॥
३३. अथ ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्। मा नो अति ख्य आ गहि॥३॥
सोमपान कर लेने के अनन्तर हे इंद्रदेव ! हम आपके अत्यन्त समीपवर्त्ती श्रेष्ठ प्रज्ञावान पुरूषो की उपस्थिति मे रहकर आपके विषय मे अधिक ज्ञान प्राप्त करें। आप भी हमारे अतिरिक्त अन्य किसी के समक्ष अपना स्वरूप प्रकट् न करे (अर्थात् अपने विषय मे न बताएं)॥३॥
३४.परेहि विग्नमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम् । यस्ते सखिभ्य् आ वरम्॥४॥
हे ज्ञानवानो! आप उन विशिष्ट बुद्धि वाले, अपराजेय इन्द्रदेव के पास जाकर मित्रो बन्धुओ के लिये धन ऐश्वर्य के निमित्त् प्रार्थना करें॥४॥
३५। उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत। दधाना इन्द्र इद्दुव:॥५॥
इन्द्रदेव की उपासना करने वाले उपासक उन(इन्द्रदेव) के निन्दको को यहां से अन्यत्र निकल जाने हो कहें; ताकि वे यहां से दूर हो जायें ॥५॥
३६. उत न: सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टय:। स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि॥६॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके अनुग्रह से समस्त वैभव प्राप्त करें। जिससे देखनेवाले शभी शत्रु और् मित्र हमे सौभाग्यशाली समझे॥६॥
३७ एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्। पतयन्मन्दयत् सखम् ॥७॥
(हे याजको !) यज्ञ को श्रीसमपन्न बनाने वाले , प्रसन्न्ता प्रदान करने वाले, मित्रो को आनन्द देने वाले इस सोमरस को शीघ्रगामी इन्द्रदेव के लिये भरें (अर्पित करें) ॥७॥
३८. अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभव:। प्रावो वाजेषु वाजिनम्
॥८॥
हे सैकड़ो यज्ञ सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव! इस सोमरस को पीकर आप वृत्र-प्रमुख शत्रुओ के संहारक सिद्ध हुये है,अत: आप संग्राम-भूमि मे वीर योद्दाओ की रक्षा करे॥८॥
३९.तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयाम: शतक्रतो। धनानामिन्द्र सातये॥९॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! युद्धो मे बल प्रदान करने वाले आपको हम धनि की प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ हविष्यान्न अर्पित करते हैं॥९॥
४०. यो रायो३वनिर्महान्त्सुपार: सुन्वत: सखा। तस्मा इन्द्राय गायत।।१०॥हे याजको! आप उन इन्द्रदेव के लिये स्तोत्रो का गान करें , जो धनो के महान् रक्षक, दु:खो को दूर करने वाले और् याज्ञिको से मित्रवत् भाव रखने वाले है॥१०॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३
[ऋषि मधुच्छन्दा वैश्वामित्र। देवता १-३ अश्विनीकुमार, ४-६ इन्द्र,७-९ विश्वेदेवा,१०-१२ सरश्वती। छन्द गायत्री]
१९. अश्विना यज्वरीरिषो द्रवपाणी शुभस्पती। पुरुभुजा चनस्यतम् ॥१॥
हे विशालबाहो ! शुभ कर्मपालक,द्रुतगति से कार्य सम्पन्न करने वाले अश्विनी कुमारो ! हमारे द्वारा समर्पित् हविष्यान्नो से आप भली प्रकार सन्तुष्ट हों ॥१॥
२०. अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरता धिया । धिष्ण्या वनतं गिर:॥२॥
असंख्य कर्मो को संपादित करनेवाले धैर्य धारण करने वाले बुद्धिमान हे अश्विनीकुमारो ! आप अपनी उत्तम बुद्धि से हमारी वाणियों (प्रार्थनाओ को स्वीकार् करे ॥२॥
२१. दस्ना युवाकव: सुता नासत्या वृक्तबर्हिष: । आ यातं रुद्रवर्तनी॥३॥
रोगो को विनष्ट करने वाले, सदा सत्य बोलने वाले रूद्रदेव के समान (शत्रु संहारक) प्रवृत्ति वाले, दर्शनीय हे अश्विनीकुमारो ! आप यहां आये और् बिछी हुई कुशाओ पर् विराजमान होकर प्रस्तुत संस्कारित सोमरस का पान करें॥३॥
२२. इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायव: । अण्वीभिस्तना पूतास:॥४॥
हे अद्भूत् दीप्तिमान् इन्द्रदेव ! अंगुलियों द्वारा स्रवित्, श्रेष्ठ पवित्ररायुक्त यह सोमरस आपके निमित्त् है। आप आये और सोमरस का पान करें ॥४॥
२३. इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावत: । उपब्रम्हाणि वाघत:॥५॥
हे इन्द्रदेव ! श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा जानने योग्य आप,सोमरस प्रस्तुत करते हुये ऋत्विजो के द्वारा बुलाये गये है। उनकी स्तुति के आधार पर् आप यज्ञशाला मे पधारें ॥५॥
२४. इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रम्हाणि हरिव: । सुते दधिष्व नश्चन:॥६॥
हे अश्वयुक्त इन्द्रदेव ! आप स्तवनो के श्रवणार्थ एवं इस यज्ञ मे हमारे द्वारा प्रदत्त हवियो का सेवन करने के लिये यज्ञशाला मे शीघ्र ही पधारें ॥६॥
२५ . ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास् आ गत। दाश्वांसो दाशुष: सुतम्॥७॥
हे विश्वदेवो ! आप सबकी रक्षा करने वाले, सभी प्राणीयो के आधारभूत और् सभी को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले है। अत आप इस सोमयुक्त हवि देने वाले यजमान के यज्ञमे पधारे ॥७॥
२६. विश्वे देवासो अप्तुर: सुत्मा गन्त तूर्णय: । उस्ना इव स्वसराणि॥८॥
समय समय पर् वर्षा करने वाले हे विश्वदेवो ! आप कर्म कुशल और् द्रुतगति से कार्य करने वाले है। आप सूर्य-रश्मियो के सदृश गतिशील होकर हमे प्राप्त हो ॥८॥
२७. विश्वे देवासो अस्निध एहिमायासो अद्रुह: मेधं जुषण्त वह्रय:॥९॥
हे विश्वदेवो ! आप किसी के द्वारा वध ब किये जाने वाले, कर्म कुशल, द्रोह रहित और् सुखप्रद है। आप हमारे यज्ञ मे उपस्थित होकर हवि का सेवन करें ॥९॥
२८. पावका न: सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसु:॥१०॥
पवित्र बनाने वाकी, पोषण देने वाली, बुद्धीमत्तापूर्वक ऐश्वर्य प्रदान करने वाकी सरश्वती ज्ञान और कर्म से हमारे यज्ञ को सफल बनायें ॥१०॥
२९. चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् यज्ञं दधे सरस्वती॥११॥
सत्यप्रिय (वचन) बोलने की प्रेरणा देने वाली, मेधावी जनो को यज्ञानुष्ठान की प्रेरणा (मति) प्रदान करने वाली देवी सरस्वती हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करके हमे अभीष्ट वैभव प्रदान करे ॥११॥
३०. महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना॥ धियो विश्वां वि राजति॥१२॥
जो देवी सरस्वती नदी रूप् मे प्रभूत जल को प्रवाहित करती है। वे सुमति को जगाने वाली देवी सरस्वती सभी याजको की प्रज्ञा को प्रखर बनाती है ॥१२॥
ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २
१०. वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृता:। तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥१॥
हे प्रियदर्शी वायुदेव। हमारी प्रार्थना को सुनकर यज्ञस्थल पर आयें। आपके निमित्त सोमरस प्रस्तुत है, इसका पान करें ॥१॥
११. वाय उक्वेथेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितार: । सुतसोमा अहर्विद: ॥२॥
हे वायुदेव ! सोमरस तैयार करके रखनेवाले, उसके गुणो को जानने वाले स्तोतागण स्तोत्रो से आपकी उत्तम प्रकार से स्तुति करते हैं ॥२॥
१२. वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे। उरूची सोमपीतये ॥३॥
हे वायुदेव ! आपकी प्रभावोत्पादक वाणी, सोमयाग करने वाले सभी यजमानो की प्रशंसा करती हुई एवं सोमरस का विशेष गुणगान करती हुई, सोमरस पान करने की अभिलाषा से दाता (यजमान) के पास पहुंचती है ॥३॥
१३. इन्द्रवायू उमे सुता उप प्रयोभिरा गतम् । इन्दवो वामुशान्ति हि ॥४॥
हे इन्द्रदेव! हे वायुदेव! यह सोमरस आपके लिये अभिषुत किया (निचोड़ा) गया है। आप अन्नादि पदार्थो से साथ यहां पधारे, क्योंकि यह सोमरस आप दोनो की कामना करता हौ ।४॥
१४. वायविन्द्रश्च चेतथ: सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्रवत् ॥५॥
हे वायुदेव! हे इन्द्रदेव! आप दोनो अन्नादि पदार्थो और धन से परिपुर्ण है एवं अभिषुत सोमरस की विशेषता को जानते है। अत: आप दोनो शिघ्र ही इस यज्ञ मे पदार्पण करें।
१५. वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम् । मक्ष्वि१त्था धिया नरा ।६॥
हे वायुदेव! हे इन्द्रदेव ! आप दोनो बड़े सामर्थ्यशाली है। आप यजमान द्वारा बुद्धिपूर्वक निष्पादित सोम के पास अति शीघ्र पधारें ॥६॥
१६. मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् । धियं घृताचीं साधन्ता ॥७॥
घृत के समान प्राणप्रद वृष्टि सम्पन्न कराने वाले मित्र और वरुण देवो का हम आवाहन करते है। मित्र हमे बलशाली बनायें तथा वरुणदेव हमारे हिंसक शत्रुओ का नाश करें ।७॥
१७. ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधारुतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥८॥
सत्य को फलितार्थ करने वाले सत्ययज्ञ के पुष्टिकारज देव मित्रावरुणो ! आप दोनो हमारे पुण्यदायी कार्यो (प्रवर्तमान सोमयाग) को सत्य से परिपूर्ण करें ॥८॥
१८. कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥९॥
अनेक कर्मो को सम्पन्न कराने वाले विवेकशील तथा अनेक स्थलो मे निवास करने वाले मित्रावरुण् हमारी क्षमताओ और कार्यो को पुष्ट बनाते हैं ॥९॥