ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३१

[ऋषि -हिरण्यस्तूप अंङ्गिरस। देवता- अग्नि। छन्द जगती ८,१६,१८ त्रिष्टुप।]

३५१.त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऋषिर्देवो देवानामभवः शिवः सखा ।
तव व्रते कवयो विद्मनापसोऽजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः ॥१॥
हे अग्निदेव! आप सर्वप्रथम अंगिरा ऋषि के रूप मे प्रकट हुये, तदनन्तर सर्वद्रष्टा, दिव्यतायुक्त, कल्याणकारी और देवो के सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। आप के व्रतानुशासन से मरूद गण क्रान्तदर्शी कर्मो के ज्ञाता और श्रेष्ठ तेज आयुधो से युक्त हुये है॥१॥

३५२.त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरस्तमः कविर्देवानां परि भूषसि व्रतम् ।

विभुर्विश्वस्मै भुवनाय मेधिरो द्विमाता शयुः कतिधा चिदायवे ॥२॥
हे अग्निदेव! आप अंगिराओ मे आद्य और शिरोमणि है। आप देवताओ के नियमो को सुशोभित करते है। आप संसार मे व्याप्त तथा दो माताओ वाले दो अरणियो से समुद्भूत होने से बुद्धिमान है। आप मनुष्यों के हितार्थ सर्वत्र विद्यमान रहते हैं॥२॥

३५३.त्वमग्ने प्रथमो मातरिश्वन आविर्भव सुक्रतूया विवस्वते ।
अरेजेतां रोदसी होतृवूर्येऽसघ्नोर्भारमयजो महो वसो ॥३॥
हे अग्निदेव! आप ज्योतिर्मय सूर्यदेव के पूर्व और वायु के भी पूर्व आविर्भूत हुए। आपके बल से आकाश और पृथ्वी कांप गये। होता रूप मे वरण किये जाने पर आपने यज्ञ के कार्य का संपादन किया। देवो का यजनकार्य पूर्ण करने के लिये आप यज्ञ वेदी पर स्थापित हुए ॥३॥


३५४.त्वमग्ने मनवे द्यामवाशयः पुरूरवसे सुकृते सुकृत्तरः ।
श्वात्रेण यत्पित्रोर्मुच्यसे पर्या त्वा पूर्वमनयन्नापरं पुनः ॥४॥
हे अग्निदेव! आप अत्यन्त श्रेष्ठ कर्म वाले है। आपने मनु और सुकर्मा-पुरूरवा को स्वर्ग के आशय से अवगत कराया। जब आप मातृ पितृ रूप दो काष्ठो के मंथन से उत्पन्न हुये, तो सूर्यदेव की तरह पूर्व से पश्चिम तक व्याप्त हो गये॥४॥

३५५.त्वमग्ने वृषभः पुष्टिवर्धन उद्यतस्रुचे भवसि श्रवाय्यः ।
य आहुतिं परि वेदा वषट्कृतिमेकायुरग्रे विश आविवाससि ॥५॥
हे अग्निदेव! आप बड़े बलिष्ठ और पुष्टिवर्धक है। हविदाता, स्त्रुवा हाथ मे लिये स्तुति को उद्यत है, जो वषटकार युक्त आहुति देता है, उस याजक को आप अग्रणी पुरुष के रूप मे प्रतिष्ठित करते है॥५॥


३५६.त्वमग्ने वृजिनवर्तनिं नरं सक्मन्पिपर्षि विदथे विचर्षणे ।
यः शूरसाता परितक्म्ये धने दभ्रेभिश्चित्समृता हंसि भूयसः ॥६॥
हे विशिष्ट द्रष्टा अग्निदेव! आप पापकर्मियो का भी उद्धार करते है। बहुसंख्यक शत्रुओ का सब ओर से आक्रमण होने पर भी थोड़े से वीर पुरुषो को लेकर सब शत्रुओ को मार गिराते है॥६॥

३५७.त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्तं दधासि श्रवसे दिवेदिवे ।
यस्तातृषाण उभयाय जन्मने मयः कृणोषि प्रय आ च सूरये ॥७॥
हे अग्निदेव! आप अपने अनुचर मनुष्यो को दिनप्रतिदिन अमरपद का अधिकारी बनाते है, जिसे पाने की उत्कट अभिलाषा देवगण और मनुष्य दोनो की करते रहते है। वीर पुरुषो को अन्न और धन द्वारा सुखी बनाते हैं॥७॥

३५८.त्वं नो अग्ने सनये धनानां यशसं कारुं कृणुहि स्तवानः ।
ऋध्याम कर्मापसा नवेन देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः ॥८॥
हे अग्निदेव! प्रशंसित होने वाले आप हमे धन प्राप्त करने की सामर्थ्य दें। हमे यशस्वी पुत्र प्रदान करें। नये उत्साह के साथ हम यज्ञादि कर्म करें। द्यावा, पृथ्वी और देवगण सब प्रकार से रक्षा करें॥८॥

३५९.त्वं नो अग्ने पित्रोरुपस्थ आ देवो देवेष्वनवद्य जागृविः ।
तनूकृद्बोधि प्रमतिश्च कारवे त्वं कल्याण वसु विश्वमोपिषे ॥९॥
हे निर्दोष अग्निदेव! सब देवो मे चैतन्य रूप आप हमारे मातृ पितृ (उत्पन्न करने वाले) हैं। आप ने हमे बोध प्राप्त करने की सामर्थ्य दी, कर्म को प्रेरित करने वाली बुद्धि विकसित की। हे कल्याणरूप अग्निदेव ! हमे आप सम्पूर्ण ऐश्वर्य भी प्रदान करें॥९॥

३६०.त्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्वं वयस्कृत्तव जामयो वयम् ।
सं त्वा रायः शतिनः सं सहस्रिणः सुवीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य ॥१०॥
हे अग्निदेव! आप विशिष्ट बुद्धि-सम्पन्न, हमारे पिता रूप, आयु प्रदाता और बन्धु रूप है। आप उत्तमवीर, अटलगुण सम्पन्न, नियम-पालक और असंख्यो धनो से सम्पन्न है॥१०॥


३६१.त्वामग्ने प्रथममायुमायवे देवा अकृण्वन्नहुषस्य विश्पतिम् ।
इळामकृण्वन्मनुषस्य शासनीं पितुर्यत्पुत्रो ममकस्य जायते ॥११॥
हे अग्निदेव! देवताओ ने सर्वप्रथम आपको मनुष्यो के हित के लिये राजा रूप मे स्थापित किया। तपश्चात जब हमारे (हिरण्यस्तूप ऋषि) पिता अंगिरा ऋषि ने आपको पुत्र रूप मे आविर्भूत किया, तब देवतओ ने मनु की पुत्री इळा को शासन-अनुशासन(धर्मोपदेश) कर्त्री बनाया॥११॥


३६२.त्वं नो अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य ।
त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेषं रक्षमाणस्तव व्रते ॥१२॥
हे अग्निदेव! आप वन्दना के योग्य है। आप रक्षण साधनो से धनयुक्त हमारी रक्षा करें। हमारी शारीरिक क्षमता को अपनी सामर्थ्य से पोषित करें। शीघ्रतापूर्वक संरक्षित करने वाले आप हमारे पुत्र-पौत्रादि और गवादि पशुओं के संरक्षक हों॥१२॥


३६३.त्वमग्ने यज्यवे पायुरन्तरोऽनिषङ्गाय चतुरक्ष इध्यसे ।
यो रातहव्योऽवृकाय धायसे कीरेश्चिन्मन्त्रं मनसा वनोषि तम् ॥१३॥
हे अग्निदेव आप याजको के पोषक है, जो सज्जन हविदाता आपको श्रेष्ठ, पोषक हविष्यान्न देते है, आप उनकी सभी प्रकार से रक्षा करते हैं। आप साधको(उपासको) की स्तुति हृदय से स्वीकार करते है॥१३॥


३६४.त्वमग्न उरुशंसाय वाघते स्पार्हं यद्रेक्णः परमं वनोषि तत् ।
आध्रस्य चित्प्रमतिरुच्यसे पिता प्र पाकं शास्सि प्र दिशो विदुष्टरः ॥१४॥
हे अग्निदेव! आप स्तुति करने वाले ऋत्विजो को धन प्रदान करते गौ। आप दुर्बलो को पिता रूप मे पोषण देनेवाले और अज्ञानी जनो को विशिष्ट ज्ञान प्रदान करने वाले मेधावी है॥१४॥

३६५.त्वमग्ने प्रयतदक्षिणं नरं वर्मेव स्यूतं परि पासि विश्वतः ।
स्वादुक्षद्मा यो वसतौ स्योनकृज्जीवयाजं यजते सोपमा दिवः ॥१५॥
हे अग्निदेव! आप पुरुषार्थी यजमानो की कवच रूप मे सुरक्षा करते है। जो अपने घर मे मधुर हविष्यान्न देकर सुखप्रद यज्ञ करता है वह घर स्वर्ग की उपमा के योग्य होता है॥१५॥

३६६.इमामग्ने शरणिं मीमृषो न इममध्वानं यमगाम दूरात् ।
आपिः पिता प्रमतिः सोम्यानां भृमिरस्यृषिकृन्मर्त्यानाम् ॥१६॥
हे अग्निदेव! आप यज्ञ कर्म करते समय हुई हमारी भूलों को क्षमा करे, जो लोग यज्ञ मार्ग से भटक गये है, उन्हे भी क्षमा करें। आप सोमयाग करने वाले याजको के बन्धु और पिता है। सद्बुद्धि प्रदान करनेवाले ऐर ऋषिकर्म के कुशल प्रणेता है॥१६॥

३६७.मनुष्वदग्ने अङ्गिरस्वदङ्गिरो ययातिवत्सदने पूर्ववच्छुचे ।
अच्छ याह्या वहा दैव्यं जनमा सादय बर्हिषि यक्षि च प्रियम् ॥१७॥
हे पवित्र अंगिरा अग्निदेव! (अंगो मे व्याप्त अग्नि) आप मनु, अंगिरा(ऋषि), ययाति जैसे पुरुषो के साथ देवो को ले जाकर यज्ञ स्थल पर सुशोभित हों। उन्हे कुश के आसन पर प्रतिष्ठित करते हुये सम्मानित करें॥१७॥

३६८.एतेनाग्ने ब्रह्मणा वावृधस्व शक्ती वा यत्ते चकृमा विदा वा ।
उत प्र णेष्यभि वस्यो अस्मान्सं नः सृज सुमत्या वाजवत्या ॥१८॥
हे अग्निदेव! इन मंत्र रूप स्तुतियों से आप वृद्धि को प्राप्त करें। अपनी शक्ति या ज्ञान से हमने जो यजन किया है, उससे हमे ऐश्वर्य प्रदान करें। बल बढाने वाले अन्नो के साथ शुभ मति से हमे सम्पन्न करें॥१८॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त ३०

[ऋषि- शुनः शेप आजीगर्ति। देवता १-१६ इन्द्र, १७-१९ अश्‍विनीकुमार, २०-२२ उषा। छन्द १-१०,१२-१५ तथा १७-२२ गायत्री,११ पादनिचृत् गायत्री,१६ त्रिष्टूप्।]

३२९.आ व इन्द्रं क्रिविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम्। मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः॥१॥
जिस प्रकार अन्न की इच्छा वाले,खेत मे पानी सींचते है, उसी तरह हम बल की कामना वाले साधक इन महान् इन्द्रदेव को सोमरस से सींचते है॥१॥

३३०.शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदु निम्नं न रीयते॥२॥
नीचे की ओर जाने वाले जल के समान सैकड़ो कलश सोमरस, सहस्त्रो कलश दूध मे मिश्रित होकर इन्द्रदेव को प्राप्त होता है॥२॥

३३१.सं यन्मदाय शुष्मिण एना ह्यस्योदरे। समुद्रो न व्यचो दधे॥३
समुद्र मे एकत्र हुये जल के सदृश सोमरस इन्द्रदेव के पेट मे एकत्र होकर उन्हे हर्ष प्रदान करता है॥३॥

३३२.अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे॥४॥
हे इन्द्रदेव ! कपोत जिस स्नेह के साथ गर्भवती कपोती के पास रहता है, उसी प्रकार यह सोमरस आपके लिये प्रस्तुत है। आप हमारे निवेदन को स्वीकारे॥४॥

३३३.स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते। विभूतिरस्तु सूनृता॥५॥
जो (स्तोतागण), हे इन्द्र! हे धनाधिपति! हे स्तुतियों के आश्रयभूत! हे वीर! (इत्यादि) स्तुतियाँ करते है, उनके लिये आपकी विभूतियाँ प्रिय एवं सत्य सिद्ध हो॥५

३३४.ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतयेऽस्मिन्वाजे शतक्रतो। समन्येषु ब्रवावहै॥६॥
सैकड़ो यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यो को सम्पन्न करने वाले हे इन्द्रदेव! संघर्षो (जीवन संग्राम) मे हमारे संरक्षण के लिये आप प्रयत्नशील रहे। हम आप से अन्य (श्रेष्ठ) कार्यो के विषय मे भी परस्पर विचार-विनिमय करते रहे॥६॥

३३५.योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥७॥
सत्कर्मो के शुभारम्भ मे एवं हर प्रकार के संग्राम मे बलशाली इन्द्रदेव का हम अपने संरक्षण के लिये मित्रवत आवाहन करते हैं॥७॥

३३६.आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः। वाजेभिरुप नो हवम्॥८॥
हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर वे इन्द्रदेव निश्चित ही सहस्त्रो रक्षा साधनो तथा अन्न ,ऐश्वर्य आदि सहित हमारे पास आयेंगे॥८॥

३३७.अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्। यं ते पूर्वं पिता हुवे॥९॥
हम सहायता के लिये स्वर्गधाम के वासी, बहुतो के पास पहुँचकर उन्हे नेतृत्व प्रदान करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते है। हमारे पिता ने भी ऐसा ही किया था॥९॥

३३८.तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत। सखे वसो जरितृभ्यः॥१०॥
हे विश्ववरणीय इन्द्रदेव! बहुतो द्वारा आवाहित किये जाने वाले आप स्तोताओ के आश्रयदाता और मित्र है। हम ऋत्विग्गण आओअ से उन स्तोताओ को अनुगृहीत करने की प्रार्थना करते है॥१०॥

३३९.अस्माकं शिप्रिणीनां सोमपाः सोमपाव्नाम्। सखे वज्रिन्सखीनाम्॥११॥

हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव! सोम पीने के योग्य हमारे प्रियजनो और मित्रजनो मे आप ही श्रेष्ठ सामर्थ्य वाले है॥११॥

३४०.तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु। यथा त उश्मसीष्टये॥१२॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव! आप हमारी इच्छा पूर्ण करें। हम इष्टप्राप्ति के निमित्त आपकी कामना करे और वह पूर्ण हो॥१२॥

३४१.रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः। क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥१३॥
जिन (इन्द्रदेव) की कृपा से हम धन-धान्य से परिपूर्ण होकर प्रफुल्लित होते हैं। उन इन्द्रदेव के प्रभाव से हमारी गौएँ भी प्रचुर मात्रा मे दुग्ध-घृतादि देने की सामर्थ्य वाली हों॥१३॥

३४२.आ घ त्वावान्त्मनाप्त स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः। ऋणोरक्षं न चक्र्योः॥१४॥
हे धैर्यशाली इन्द्रदेव! आप कल्याणकारी बुद्धि से स्तुति करने वाले स्तोताओ को अभीष्ट पदार्थ अवश्य प्रदान करें। आप स्तोताओ को धन देने के लिये रथ के चक्रो को मिलाने वाली धुरी के समान ही सहायक है॥१४॥

३४३.आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम्। ऋणोरक्षं न शचीभिः॥१५॥
हे इन्द्रदेव! आप स्तोताओ द्वारा इच्छित धन उन्हे प्रदान करें। जिस प्रकार रथ की गति से उसके अक्ष को भी गति मिलती है, उसी प्रकार स्तुतिकर्ताओ को धन की प्राप्ति हो॥१५॥

३४४.शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि।
स नो हिरण्यरथं दंसनावान्स नः सनिता सनये स नोऽदात् ॥१६॥
सदैव स्फूर्तिवान,सदैव (शब्दवान) हिनहिनाते हुये तीव्र गतिशील अश्वो के द्वारा जो इन्द्रदेव शत्रुओ के धन को जीतते है; उन पराक्रमशील इन्द्रदेव ने अपने स्नेह से अपने स्नेह से हमे सोने का रथ (अकूत-वैभव) दिया है॥१६॥

३४५.आश्विनावश्वावत्येषा यातं शवीरया। गोमद्दस्रा हिरण्यवत्॥१७॥
हे शक्तिशाली अश्‍विनीकुमारो! आप बलशाली अश्वो के साथ अन्नो, गौओ और् स्वर्णादि धनो को लेकर यहाँ पधारें॥१७॥

३४६.समानयोजनो हि वां रथो दस्रावमर्त्यः। समुद्रे अश्विनेयते॥१८॥
हे अश्‍विनीकुमारो! आप दोनो के लिये जुतने वाला एक ही रथ आकाशमार्ग से जाता है। उसे कोई नष्ट नही कर सकता॥१८॥

३४७.न्यघ्न्यस्य मूर्धनि चक्रं रथस्य येमथुः। परि द्यामन्यदीयते॥१९
हे अश्‍विनीकुमारो! आप के रथ (पोषण प्रक्रिया) का एक चक्र पृथ्वी के मूर्धा भाग मे (पर्यावरण चक्र के रूप मे) स्थित है और दूसरा चक्र द्युलोक मे सर्वत्र गतिशील है॥१९॥

३४८.कस्त उषः कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये। कं नक्षसे विभावरि॥२०
हे स्तुति-प्रिय, अमर, तेजोमयी उषे! कौन मनुष्य आपका अनुदान प्राप्त करता है ? किसे आप प्राप्त होती है? (अर्थात प्रायः सभी मनुष्य आलस्यादि दोषो के कारणा आप का लाभ पूर्णतया नही प्राप्त कर पाते)॥२०॥

३४९.वयं हि ते अमन्मह्यान्तादा पराकात्। अश्वे न चित्रे अरुषि ॥२१॥
हे अश्‍व (किरणो) युक्त चित्र विचित्र प्रकाश वाली उषे! हम दूर अथवा पास से आपकी महिमा समझने मे समर्थ नही है॥२१॥

३५०.त्वं त्येभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः। अस्मे रयिं नि धारय ॥२२॥
हे द्युलोक की पुत्री उषे! आप उन (दिव्य) बलो के साथ यहाँ आयें और हमे उत्तम ऐश्वर्य धारण करायें॥२२॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २९

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता इन्द्र।छन्द पंक्ति।]

३२२.यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥१॥
हे सत्य स्वरूप सोमपायी इन्द्रदेव! यद्यपि हम प्रशंसा के पात्र तो नही है, तथापि हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥१॥
३२३.शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप शक्तिशाली, शिरस्त्राण धारण करने वाले, बलो के अधीश्वर और ऐश्वर्यशाली है। आपका सदैव हम पर अनुग्रह बना रहे। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥२॥
३२४.नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥३॥
हे इन्द्रदेव! दोनो दुर्गतियाँ (विपत्ति और दरिद्रता) परस्पर एक दूसरे को देखती हुई सो जायें। वे कभी न जागें, वे अचेत पड़ी रहें।हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥३॥
३२५.ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥४॥
हे इन्द्रदेव! हमारे शत्रु सोते रहें और हमारे विर मित्र जागते रहे। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥४॥
३२६.समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! कपटपूर्ण वाणी बोलनेवाले शत्रु रूप गधे को मार डालें। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥५॥
३२७.पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! विध्वंशकारी बवंडर वनो से दूर जाकर गिरें। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥६॥
३२८.सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! हम पर आक्रोश करने वाले सब शत्रुओ को विनष्ट करें। हिंसको का नाश करें। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमे सहस्त्रो श्रेष्ठ गौंएँ और घोड़े प्रदान करके संपन्न बनायें॥ ७॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २८

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता १-४ इन्द्र,५-६ उलूखल,७-८ उलूखल-मूसल,९ प्रजापति,हरिश्चन्द्रः,अधिषवणचर्म अथवा सोम छन्द १-६ अनुष्टुप,७-९ गायत्री।]

३१३.यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥१॥
हे इन्द्रदेव! जहाँ (सोमवल्ली) कूटने के लिए बड़ा मूसल उठाया जाता है(अर्थात सोमरस तैयार किया जाता है), वहाँ(यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥१॥
३१४.यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥२॥
हे इन्द्रदेव! जहाँ दो जंघाओ के समान विस्तृत,सोम कुटने के दो फलक रखे है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥२॥
३१५.यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥३॥
हे इन्द्रदेव! जहाँ गृहिणी सोमरस कुटने का अभ्यास करती है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥३॥
३१६.यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव। उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः॥४॥
हे इन्द्रदेव! जहाँ सारथी द्वारा घोड़े को लगाम लगाने के समान (मथनी को) रस्सी से बाँधकर मन्थन लरते है, वहाँ (यज्ञशाला मे) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥४॥
३१७.यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः॥५॥
हे उलूखल! यद्यपि घर घर मे तुमसे काम लिया जाता है, फिर भी हमारे घर मे विजय दुन्दुभि के समान उच्च शब्द करो॥५॥
३१८.उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्। अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल॥६॥
हे उलूखल - मूसल रूपे वनस्पति! तुम्हारे सामने वायु विशेष गति से बहती है। हे उलूखल! अब इन्द्रदेव के सेवनार्थ सोमरस का निष्पादन करो॥६॥
३१९.आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भृतः। हरी इवान्धांसि बप्सता॥७॥
यज्ञ के साधन रूप पूजन योग्य वे उलूखल और मूसल दोनो, अन्न(चने) खाते हुये इन्द्रदेव के दोनो अश्वो के समान उच्च स्वर से शब्द करते हैं॥७॥
३२०.ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः। इन्द्राय मधुमत्सुतम्॥८॥
दर्शनीय उलूखल एवं मूसल रूपे वनस्पते! आप दोनो सोमयाग करने वालों के साथ इन्द्रदेव के लिये मधुर सोमरस का निष्पादन करो॥८॥
३२१.उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि॥९॥
उलूखल और मूसल द्वारा निष्पादित सोम को पात्र से निकाल कर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और अवशिष्ट को छानने के लिये पवित्र चर्म पर रखें॥९॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २७

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता १-१२अग्नि, १३ देवतागण। छन्द १-१२ गायत्री,१३ त्रिष्टुप।]

३००.अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः। सम्राजन्तमध्वराणाम्॥१॥
तमोनाशक, यज्ञो के सम्राट स्वरूप हे अग्निदेव! हम स्तुतियो ले द्वारा आपकी वंदना करते है। जिस प्रकार अश्व अपनी पूँछ के बालो से मक्खी मच्छर दूर भगाता है, उसी प्रकार आप भी ज्वालाओ से हमारे विरोधियों को दूर भगायें॥१॥
३०१.स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः। मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्॥२॥
हम इन अग्निदेव की उत्तम विधि से उपासना करते है। वे बल से उत्पन्न, शीघ्र गतिशील अग्निदेव हमे अभिष्ट सुखो को प्रदान करें॥२॥
३०२.स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायोः। पाहि सदमिद्विश्वायुः॥३॥
हे अग्निदेव! सब मनुष्यो के हितचिंतक आप दूर से और निकट से, अनिष्ट चिंतको से सदैव हमारी रक्षा करें॥३॥
३०३.इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम्। अग्ने देवेषु प्र वोचः॥४॥
हे अग्निदेव! आप हमारे गायत्री परक प्राण पोषक स्तोत्रो एवं नवीन अन्न(हव्य) को देवो रक (देव वृत्तियों के पोषण हेतु) पहुँचाये॥४॥
३०४.आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु। शिक्षा वस्वो अन्तमस्य॥५॥
हे अग्निदेव! आप हमे श्रेष्ठ (आध्यात्मिक), मध्यम(आधिदैविक) एवं कनिष्ठ(आधिभौतिक) अर्थात सभी प्रकार की धन सम्पदा प्रदान करें॥५॥
३०५.विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ। सद्यो दाशुषे क्षरसि॥६॥
सात ज्वालाओ से दीप्तिमान हे अग्निदेव! आप धनदायक है। नदी के पास आने वाली जल तरंगो ले सदृश आप हविष्यान्न दाता को तत्क्षण (श्रेष्ठ) कर्म फल प्रदान करतें है॥६॥
३०६.यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः। स यन्ता शश्वतीरिषः॥७॥
हे अग्निदेव ! आप जीवन संग्राम मे जिस पुरुष को प्रेरित करते हैं, उनकी रक्षा आप स्व्यं करते हैं। साथ ही उसके लिये पोषक अन्नो की पूर्ति भी करते हैं॥७॥
३०७.नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्। वाजो अस्ति श्रवाय्यः॥८॥
हे शत्रु विजेता अग्निदेव! आपके उपासक को कोई पराजित नही कर सकता, क्योंकि उसकी(आपके द्वारा प्रदत्त) तेजस्विता प्रसिद्ध है॥८॥
३०८.स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता। विप्रेभिरस्तु सनिता॥९॥
सब मनुष्यो के कल्याणकारक वे अग्निदेव जीवन-संग्राम मे अश्व रूपी इन्द्रियो द्वारा विजयी बनाने वाले हो। मेधावी पुरुषो द्वारा प्रशंसित वे अग्निदेव हमे अभीष्ट फल प्रदान करें॥९॥
३०९.जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय। स्तोमं रुद्राय दृशीकम्॥१०॥
स्तुतियो से देवो को प्रबोधित करने वाले हे अग्निदेव! ये यजमान, पुनीत यज्ञ स्थल पर दुष्टता विनाश हेतु आपका आवाहन करते है॥१०॥
३१०.स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः। धिये वाजाय हिन्वतु॥११॥
अपरिमिर्त धूम्र-ध्वजा से युक्त, आनन्दप्रदम महान वे अग्निदेव हमे ज्ञान और वैभव की ओर प्रेरित करें॥११॥
३११.स रेवाँ इव विश्पतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः। उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः॥१२॥
विश्वपालक, अत्यन्त तेजस्वी और ध्वजा सदृश गुणो से युक्त दूरदर्शी वे अग्निदेव वैभवशाली राजा के समान हमारी स्तवन रूपी वाणियो को ग्रहण करें॥१२॥
३१२.नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः।
यजाम देवान्यदि शक्नवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः॥१३॥
बड़ो, छोटोम युवको और वृद्धो को हम नमस्कार करते है। सामर्थ्य के अनुसार हम देवो का यजन करें। हे देवो! अपने से बड़ो के सम्मान मे हमारे द्वारा कोई त्रुटी न हो॥१३॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २६

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता अग्नि।छन्द गायत्री।]

वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जां पते। सेमं नो अध्वरं यज॥१॥
हे यज्ञ योग्य अन्नो के पालक अग्निदेव! आप अपने तेजरूप वस्त्रो को पहनकर हमारे यज्ञ को सम्पादित करें॥१॥
नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः। अग्ने दिवित्मता वचः॥२॥
सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव! आप सर्वोत्तम होता(यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप मे यज्ञकुण्ड मे स्थापित होकर स्तुति वचनो का श्रवण करें॥२॥
आ हि ष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये। सखा सख्ये वरेण्यः॥३॥
हे वरण करने योग्य अग्निदेव! जैसे पिता अपने पुत्र के,भाई अपने भाई के और मित्र अपने मित्र के सहायक होते है, वैसे ही आप हमारी सहायता करें॥३॥
आ नो बर्ही रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा। सीदन्तु मनुषो यथा॥४॥
जिस प्रकार प्रजापति के यज्ञ मे "मनु " आकर शोभा बढा़ते हैं, उसी प्रकार शत्रुनाशक वरुणदेव, मित्र-देव एवं अर्यमादेव हमारे यज्ञ मे आकर विराजमान हो॥४॥
पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च। इमा उ षु श्रुधी गिरः॥५॥
पुरातन होता हे अग्निदेव! आप हमारे इस यज्ञ से और हमारे मित्रभाव से प्रसन्न हों और हमारी स्तुतियों को भली प्रकार से सुने॥५॥
यच्चिद्धि शश्वता तना देवंदेवं यजामहे। त्वे इद्धूयते हविः॥६॥
हे अग्निदेव! इन्द्र, वरुण आदि अन्य देवताओ के लिये प्रतिदिन विस्तृत आहुतियाँ अर्पित करने पर भी सभी हविष्यमान आपको ही प्राप्त होते है॥६॥
प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः। प्रियाः स्वग्नयो वयम्॥७॥
यज्ञ समपन्न करने वाले प्रजापालक, आनदवर्धक,वरण करने योग्य हे अग्निदेव आप हमे प्रिय हो तथा श्रेष्ठ विधि से यज्ञाग्नि की रक्षा करते हुये हम सदैव आपके प्रिय रहें॥७॥
स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च नः। स्वग्नयो मनामहे॥८॥
उत्तम अग्नि से युक्त हो कर दैदीप्यमान ऋत्विजो के हमारे लिये ऐश्वर्य को धारण किया है, वैसे जी हम उत्तम अग्नि से युक्त होकर इनका (ऋत्विज) का स्वागत करते है॥८॥
अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम्। मिथः सन्तु प्रशस्तयः॥९॥
अमरत्व को धारण करने वाले हे अग्निदेव! आपके और हम मरणशील मनुष्यो के बीच स्नेहयुक्त और प्रशंसनीय वाणियो का आदान प्रदान होता रहे॥९॥
विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः। चनो धाः सहसो यहो॥१०॥
बल के पुत्र(अरणि मन्थन के रूप शक्ति से उत्पन्न) भे अग्निदेव! आप(आहवनीयादि) अग्नियो के साथ यज्ञ मे पधारें और स्तुतियों को सुनते हुये अन्न(पोषण) प्रदान करें॥१०॥

ऋग्वेद-संहिता - प्रथम मंडल सूक्त २५

[ऋषि- शुन:शेप आजीगर्ति। देवता वरुण।छन्द गायत्री।]

२६९.यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्। मिनीमसि द्यविद्यवि॥१॥
हे वरुणदेव! जैसे अन्य मनुष्य आपके व्रत अनुष्ठान मे प्रमाद करते है,वैसे ही हमसे भी आपके नियमो मे कभी कभी प्रमाद हो जाता है।(कृपया इसे क्षमा करें)॥१॥
२७०.मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः। मा हृणानस्य मन्यवे॥२॥
हे वरुणदेव! आपने अपने निरादर करने वाले का वध करने के लिये धारण किये गये शस्त्र के सम्मुख हमे प्रस्तुत न करें। अपनी क्रुद्ध अवस्था मे भी हम पर कृपा कर क्रोध ना करें॥२॥
२७१.वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्। गीर्भिर्वरुण सीमहि॥३॥
हे वरुणदेव! जिस प्रकार रथी अपने थके घोड़ो की परिचर्या करते हैं, उसी प्रकार आपके मन को हर्षित करने के लिये हम स्तुतियो का गान करते हैं॥३॥
२७२.परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये। वयो न वसतीरुप॥४॥
हे वरुणदेव! जिस प्रकार पक्षी अपने घोसलो की ओर दौड़ते हुये गमन करते है,उसी प्रकार हमारी चंचल बुद्धियाँ धन प्राप्ति के लिये दूर दूर तक दौड़ती है॥४॥
२७३.कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे। मृळीकायोरुचक्षसम्॥५॥
बल ऐश्वर्य के अधिपति सर्वद्रष्टा वरुणदेव को कल्याण के निमित्त हम यहाँ (यज्ञस्थल मे) कब बुलायेंगे?(अर्थात यह अवसर कब मिलेगा?)॥५॥
२७४.तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः। धृतव्रताय दाशुषे॥६॥
व्रत धारण करने वाले(हविष्यमान)दाता यजमान के मंगल के निमित्त ये मित्र और वरुण देव हविष्यान की इच्छा करते है, वे कभी उसका त्याग नही करते। वे हमे बन्धन से मुक्त करें॥६॥
२७५.वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्। वेद नावः समुद्रियः॥७॥
हे वरुण देव! आकाश मे उड़ने वाले पक्षियो के मार्ग को और समुद्र मे संचार करने वाली नौकाओ के मार्ग को भी आप जानते है॥७॥
२७६.वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः। वेदा य उपजायते॥८॥
नियम धारक वरुणदेव प्रजा के उपयोगी बारह महिनो को जानते है और तेरहवे मास(पुरुषोत्तम मास) को भी जानते है॥८॥
२७७.वेद वातस्य वर्तनिमुरोरृष्वस्य बृहतः। वेदा ये अध्यासते॥९॥
वे वरुणदेव अत्यन्त विस्तृत,दर्शनिय और अधिक गुणवान वायु के मार्ग को जानते है। वे उपर द्युलोक मे रहने वाले देवो को भी जानते हैं॥९॥
२७८.नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा। साम्राज्याय सुक्रतुः॥१०॥
प्रकृति के नियमो का विधिवत पालन कराने वाले,श्रेष्ठ कर्मो मे सदैव निरत रहने वाले वरुणदेव प्रजाओ मे साम्राज्य स्थापित करने के लिये बैठते है॥१०॥
२७९.अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति। कृतानि या च कर्त्वा॥११॥
सब अद्‍भुत कर्मो की क्रिया विधि जानने वाले वरुणदेव, जो मर्म संपादित हो चुके है और जो किये जाने वाले है, उन सबको भली-भांति देखते है॥११॥
२८०.स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत्। प्र ण आयूंषि तारिषत्॥१२॥
वे उत्तम कर्मशील अदिति पुत्र वरुणदेव हमे सदा श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढा़यें॥१२॥
२८१.बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्। परि स्पशो नि षेदिरे॥१३॥
सुवर्णमय कवच धारण करके वरुणदेव अपने हस्ट-पुष्ट शरीर को सुसज्जित करते है। शुभ्र प्रकाश किरणे उनके चारो ओर विस्तीर्ण होती है॥१३॥
२८२.न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम्। न देवमभिमातयः॥१४॥
हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु-जन(भयाक्रान्त होकर) जिनकी हिंसा नही कर पाते, लोगो के प्रति द्वेष रखने वाले , जिनसे द्वेष नही कर पाते ऐसे वरुणदेव को पापीजन स्पर्श तक नही कर पाते॥१४॥
२८३.उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या। अस्माकमुदरेष्वा॥१५॥
जिन वरुणदेव ने मनुष्यो के लिये विपुल अन्न भंडार उत्पन्न किया है;उन्होने ही हमारे उदर मे पाचन सामर्थ्य भी स्थापित की है॥१५॥
२८४.परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु। इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥१६॥
उस सर्वद्रष्टा वरुणदेव की कामना करने वाली हमारी बुद्धीयाँ, वैसे ही उन तक पहुंचती है जैसे गौएँ श्रेष्ठ बाड़े की ओर जाती है॥१६॥
२८५.सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्। होतेव क्षदसे प्रियम्॥१७॥
होता (अग्निदेव) के समान हमारे द्वारे लाकर समर्पित की गई हवियो का आप अग्निदेव के समान भक्षण करे, फिर हम दोनो वार्ता करेंगे॥१७॥
२८६.दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि। एता जुषत मे गिरः॥१८॥
दर्शनिय वरुण को उनके रथ के साथ हमने भूमि पर देखा है। उन्होने हमारी स्तुतियाँ स्वीकारी हैं॥१८॥
२८७.इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय। त्वामवस्युरा चके॥१९॥
हे वरुणदेव! आप हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें, हमे सुखी बनायें। अपनी रक्षा के लिये हम आपकी स्तुति करते है॥१९॥
२८८.त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि। स यामनि प्रति श्रुधि॥२०॥
हे मेधावी वरुणदेव ! आप द्युलोक, भूलोक और सारे विश्व पर आधिपत्य रखते है, आप हमारे आवाहन को स्वीकार कर ’ हम रक्षा करेंगे’ ऐसा प्रत्युत्तर दे॥२०॥
२८९.उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत। अवाधमानि जीवसे॥२१॥
हे वरुणदेव! हमारे उत्तम(उपर के) पाश को खोल दे, हमारे मध्यम पाश काट दे और हमारे नीचे के पाश को हटाकर हमे उत्तम जीवन प्रदान करें॥२१॥